काया में होवे उजयारा
अलख पुरख सिमरो साधो।
गुरू परसाद साध संग पाया
अलख पुरख सिमरो साधो ।।
मंदिर जाने से क्या होवै
घट भीतर जावै तो कुछ होवे ।।
ढोल पीटने से क्या होवै
अन्त बखत देखो क्या होवे ।।
तिलक लगाने से क्या होवै
तिलक तो ज्योति बिन्दु से होवै ।।
पितरों को जल देने से क्या होवै
जिन्दो की सेवा करे तो कुछ होवै ।।
भस्म लगाने से क्या होवै
मन को भसम करे तो कुछ होवै ।।
पीर सनीचर पूजे क्या होवै
एक में एक होवै तो कुछ होवे ।।
जटा बढ़ने से क्या होवै
गुरू से प्रीत बढ़े तो कुछ होवै ।।
पंण्डत मुल्ला से क्या होवै
गुरू की सेवा करे तो कुछ होवै ।।
माला फेरे से क्या होय
दुनियाँ से मन फेरै तो कुछ होवै ।।
तागे तबीज से भला क्या होवै
सच्चा मंत्र जपे तो कुछ होवै ।।
अन्न तियागे से क्या होवे
काम कोध त्यागे तो कुछ होवे ।।
नाचने गाने से क्या होते
अन्तरधुन सुने तो कुछ होयै ।।
जोगी होने से क्या होवै
प्रगटे जोग तो कुछ हावै ।।
डबरे गाने से क्या होवें
सामगीत गावै तो कुछ होवे ।।
पर उपदेस करे क्या होवै
खुद ही समझे तो कुछ होवै ।।
देस दिसन्तरफिरे क्या होवे
गुरूवचन माने तो कुछ होवै ।।
तीरथ न्हाने से क्या होवे
मन की मैल धुले तो कुछ होवै ।।
जगराते करने से क्या होय
आत्मा में जागे तो कुछ होवे ।।
ग्रन्थ हजार पढ़े क्या होवै
![]() |
| SATPURUSH BABA FULSANDE BALE |
प्रेम के बोल पढ़े तो कुछ होवे ।।
फुलसन्दे वाले बाबा कहते
सत्तपुरख प्रभ के घर रहते ।।
सतपुरूष बावा फुलसन्दे वालो ने अपने चरणों में ध्यानमग्न बैठे परमेश्वर की राह में चलने वाले अपने
देवतुल्य शिष्यों से ये बचन कहे-वह परमेश्वर जुगों से जुगों तक संसार की पालना करता रहता है, कितनी ही
पीढ़ियों बीत जाती है कितने ही अच्छे बुरे समय बीत जाते हैं, वह परमात्मा देता ही रहता है.वो देते देते नहीं
थकता,मनुष्य उससे माँगता हुआ लजाता है,क्योंकि आदमी बुराई करता है और अच्छा फल चाहता है,काँटे बोता
है और फूल फलों की आस करता है, पाप करता है और जगत में सुख चाहता है ? उसका परिश्रम व्यर्थ हो जाता
है.शुभ सोचने से,शुभ बोलने से,ओर शुभ करने से ही शुभ की प्राप्ति होती है।
काया में होवे उजयारा अलख पुरखा सिमरो साधो ।
गुरू परसाद साध संग पाया अलख पुरख सिमरो साधो ।।
:- तुम्हारे जीवन में उजयारा हो जावेगा उस सच्चे प्रभु का
सिमरन करो और पवित्र करम करो,गुरु की किरपा से अच्छे लोगों का संग मिला है उसे खोना नहीं उसका
फायदा उठाना,गुरू की संगत में बैठकर नाम जपना अपनी आत्मा के प्रकाश को बढाना,तुम्हें सच्चे गुरू ने
देवताओं जैसा जीवन दिया है,देवआत्मा बनने का अवसर दिया है. तुम असुर ना बनना,अपने भीतर अवगुणों की
खेती ना बोना पुण्य की खेती बोना ना,जिससे दिव्य पुष्प और फल तुम्हारे जीवन के आँगन में महकें। तिलक
लगाने से क्या होवै तिलक तो ज्योति बिन्दु से होवे ।। पंडित जन तिलक लगाने का बड़ा महत्व समझाते है लगाना
भी चाहिये ये नहीं कह रहे कि अपनी अच्छी परम्पराओं को नष्ट करदो पर संतजन संत सतमुख कहते हैं-एक
साधक का सच्चा तिलक क्या है ?
वहह्मचर्य के पालन से शरीर का तेज सिमटकर तीसरे तिल पर यानी माथे के बीच आजाता है, साधनाकाल में
माथे में दिव्य ज्योत प्रगर होती है उरा प्रकाश में भूत भविष्य और तीनों लोक उजागर हो जाते हैं जीव आपे ज्योति
रूप को अपनी आँखों से देखलेता है तो फिर संसार के काम करता हुआ भी यो संसार में नहीं फसता.साधना
करते करते जब वो आतम ज्याति माथे पर धधकने लगती है उसे सतगुरू ने सच्चा और वास्तविक तिलक कहा
है मगर ये नहीं कि जो लोग तिलक लगाते हैं वे तिलक लगाना छोड़ दें? नहीं
अपने धर्म चिन्हों को हमें मिटाना नहीं चाहिये उन्हें -अपने समाज में कायम रखना चाहिये मगर जो वास्तविक
साधना का रूप है उसे भी नहीं भूलना चाहिये उसके लिये विशेष प्रयत्न में रहना चाहिये ।
भसम लगाने से क्या होवे
मनको भस्म करे तोकछ होवे।
कुछ अखाड़ों के साधू शरीर में भसम लगाते हैं मगर ज्ञान उनहें कुछ नहीं होता वे अनपढ़ होते हैं धर्म के विपरीत
आचरण करते हैं गुरू के महान बचनो का पालन नहीं करते इस लिये उनका बाहरी आचरण कुछ महत्व नहीं
रखता बल्की-दूसरों के सामने अपने को महान साधु सिद्ध आदि दिखाके अपने अभिमान को बढ़ाते हैं
और जनम अकारथ करते है चिलम पीते हैं और ससारी जो उनके पास जाते हैं उन्हें भी गलत आदतें डाल देते हैं
और लोग उन्का बड़ा आदर करते हैं और अपने जनम को खराब कर लेते हैं चाहिये तो ये था कि मन की फिजूल
तरंगों को भसम करते,पर बाहर के आडम्बर में ऐसे फसे कि निकल नहीं सकते ऐसे साध वनने से और शरीर में
भसम लगाने से कुछ नहीं होता.भसम लगाना तभी ठीक हे जब अपने मन के विकारों को एक गुरुमुख नष्ट कर
देता है और सदगुणों और उत्तम विचारों को मन में लाता है अहंकार को सम करता है कोधको भस्म करता
है.लोभ लालच को भस्म करता है,अपने जीवन से बुराई को भसम जो करदेता है.वो ही सच्चा साधक है. चाहे जो
घर में रहे या घर का त्याग करके गुरू की सेवा में रहे,अगर मन को भसम ना किया तो मन कई जनम तक इसे
धक्के खिलावेगा दुखी करेगा।
सतपुरुष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं
जटा बढ़ने से क्या होवै
गुरू से प्रीत बढ़े तो कुछ होवे ।।
ऊपर से साधु का भेष भर लिया और साधना कुछ है
करी नहीं तो ये ऐसा है जैसे लोग तमाशा करने को सॉग भर लेते है या बाजीगर खेल दिखाता है।
तिरेंगे तो वे ही जिनके हिरदै में हर है ।।
जटा के चढ़ाने से जो पापी नर तिरते
बरगद क्यों ना तरे जिनकी लम्बी जटा जड है?
तिरेंगे तो वेही जिनके हिरदै में हर है ।।
शंख बजाने से जो पापी नर तिरते
गधा क्यों ना तिरा जिसका शंख जैसा स्वर है?
तिरेंगे तो वेही जिनके हिरदै में हर है।
गंगा के नहाने से जो पापी नर तिरते
मछली क्यों नहीं तिरी जिनका गंगा में ही घर है
तिरेंगे तो वो ही जिनके हिरदै में हर है ।
अन्न छोड़ने से जो पापी नर तिरते
बछडे ना तिरे जो दूध पिवै गटर गटर हैं?
तिरेंगे तो वे ही जिनके हिरदै में हर है।
सिर के मुँडाने से जो पापी नर तिरते
भेड क्यों ना तिरी जो मुडै बर बर है?
तिरैगे तो वे ही जिनके हिरदै में हर है।
कहने का अर्थ ये है कि बाहरी रूप भरने से कुछ नही होता है अन्तःकरण पवित्र होने से ही आत्मा उरा परमेश्वर
को प्रिय लगती है। कुछ जटा बढ़ा लेते हैं और लोग उनका बड़ा आदर करते हैं कि ये तपसी हैं,और उनके साथ
कुछ समय बिताके देखो तो पता चलेगा कि क्यों साधु बने? और अब जब बन ही गये तो गुरू से कितना प्रेम है
कहे अनुसार मन को मार कर साधना में लगे हैं तो ठीक है और जो जटा बढ़ाके देस देसान्तर में वक्त काटते फिरे
और किसी को कुछ बता दिया किसी को कुछ बता दिया
तो खुद तो बे दीन हुए ही दूसरे संसारी जीवों का भी अकाज किया,साधु वो है जो रात दिन साधना में लगे रहे
विनम्र बने रहें संसारियों से कुछ इच्छा ना रखें अपने को दूसरों से उत्तम ना जाने,सबकी सेवा को तैयार रहे,और
गुरु चरणों में प्रेम को बढ़ाते जावें उनकी साधना और सज्जनता बढ़ती रहे घटे नहीं वे साध है,गुरू के प्यारे हैं।
माला फेरे से क्या होवै दुनियाँ से मन फेरै तो कुछ होवे ।।
कुछ लोग माला फेरने वालों की बड़ी बुराई और आलोचना करते हैं और इस बात से कोई ये मतलब ना लगाये
कि गुरूदेव माला जपने को मना कर रहे है माला तो एक नियम पालन का साधन है कबीर ने माला को पाखण्ड
से दूर रखने को कहा है ना कि उसे फेंक देने को कहा है, शिव माला जप रहे हैं,ब्रह्मा, सरस्वती तथा ओर कितने
ही देवी देवता ऋषि मुनि परमेश्वर के नाम का जप माला पे करते हैं पर संसारी मनुष्य जो माला जप रहे हैं माला
फेर रहे हैं और संसार से मन को जरा भी नहीं फेरा यानी नहीं पल्टा तो दुनियाँदारी ही मन में भरी रहेगी अगर
अपने को दुनियाँदार ही समझते रहे और गुरू का आज्ञाकारी
आपने को ना बनाया तो जीवन बेकार जावेगा -सतपुरुष कहते हैं माला तो फेरो पर अपने मन को भी
तो पवित्र बनाओ.इस मन को संसारी और मक्कार बनने की खुली छूट ना दो,उसे गुरू की बात मानने वाला.
विनम्र लोभ अभिमान से रहित, और पवित्र बनाओ तब माला जपने का पूरा फायदा तुम्हें मिलेग।
सत पुरूष बाबा फुलसन्द वाले कहते है-मन का मान अपमान जिन्होंने त्यागा वे ही त्याग वृत्ति वाले है, कोई कहते
हैं हमने मीठा त्याग रखा है कोई कहते हैं हम अन्न नहीं खाते.कोई कहते हैं हम दूध ही दूध पीते हैं इन बातों से परमाथी लाभ किसी को कुछ भी नहीं होता हैं उनका अभिमान बढ़ता चला जाता है जो उन्हीं के नाश का कारण
बनजाता है।
अन्न तियागे से क्या होवै काम कोध त्यागे तो कुछ होवे ।।
साधो मन का मान तियागो.
निन्दा गाना त्याने और मान अपमाना कहो नानक ये राह कठिन है कोई गुरूमुख जाना
साधो मन का मान त्यागो ।।
बहुत से लोग जाहिर तौर पर धार्मिक बातों को अपनाते हैं उनके आन्तरिक और वास्तविक रुप को नहीं जानते
और ना जानना चाहते है, कोई अन्न त्याग देते हैं और महीनो तक चाय आलू खाते रहते है नतीजा ये होता है शरीर
में तेजाब बढ़ जाता है,यहाँ ये नहीं कहा गया कि दिन में खूब खाया करो वरन अपने आहार को टीक और
व्यवस्थित करो भारी भोजन साधको को नही करना चाहिये कम से कम चाना चाहिये पर भोजन में ऐसे तत्व हो।
जो हमारे शरीर को स्वस्थ रखें ना कि जिद और हट बांधकर आदभी बैठ जावे उससे शरीर बेकार हो जावेगा
और
साधना नहीं हो सकेगी रोग शरीर में लग जावेंगे,साधक उपवास करें पर स्वास्थ का पूरा ध्यान रखे |
तली भुनी वस्तुयें खाने से बचे सादा और हल्का भोजन जो प्रतिदिन घर में बनता है वो ही सही है.ऐसा भोजन करें
जो शरीर में बीमारी और भारीपन को पैदा ना करे शरीर में फैट ना बढे हल्कापन रहे.सलाद और फल अधिक
लेवें पकवान से बचें।
जोगी होने से क्या हो ।
प्रगटे जोग तो कुछ होयै ।।
जोगी का भेष भर लेने मात्र से कुछ नहीं होता ये जीव आत्मा साधना काल में जब शरीर को छिलके की तरह
उतार कर स्वयं प्रकाश रूप होके उस परम ब्रहम से जाके जुडती है तब साधक को वास्तविक योग यानी आत्मा
के जुड़ाव का पता चलता है उससे पहले नहीं और कितने लोग योग आसन करने को ही बस योग समझते हैं
उसका नाम उन्होंने रख लिया है। योगा? शरीर को स्वस्थ रखना जरूरी है पर बस वही रूक जाना मूरखता
है,योग वह है जो आत्मा को ईश्वरीय शक्तियाँ प्रदान करें और उस सर्व व्यापी से लेजाकर जोड़ दे उससे संयुक्त
करदे पर लोग ना जाने कैसे हैं कि बस बातें बनाने में लगे रहते हैं और जो असल बात है उस पर उनका ध्यान ही
नहीं जाता पर
उपदेस करे क्या होवै
खुद ही समझे तो कुछ हो ।।
कोई दूसै को उपदेस करता रहे तो उससे कुछ होता नहीं अपने मन को ही कोई सीख देवे और उस पर चले तो
जीवन में प्रकाश होता है,दूसरों को लोग उपदेस देने में कुशल होते हैं और स्वयं गलत आदतों, में फसे रहते हैं
उनके उपदेश का किसी पर लेदर असर नहीं होता.सच्चा उपदेस वो होता है जो पहले आप धर्म का आवरण
करे जिस बात को दूसरों को कहता है पहले खुद उसमें दृढ़ होये फिर दूसरों को मजबूत करें तभी उपदेश का
महत्व है।
सत पुरुष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं एक पंडित कथा सुनाते हुए बोले भाइयों बैंगन ना खाया करो वह अच्छा
नहीं है,उनकी पत्नी भी सुन रही थी उस दिन उसने बैगन ही बनाये थे घर जाके वे फैंक दिये तभी पंडित जी आये
कि लाऔ खाना? बोली अभी सब्जी बनानी पड़ेगी बैंगन बनाये थे उन्हें फेक दिया है। पंडित जी बोले-मूरख है
क्या ? अरे ये तो दूसरों को सुनाने के लिये कथा किस्से हैं तूने उसे ही सही मान लिया बैंगनों का नाश कर दिया?
तो ये हालत है हमारे उपदेशकों की बातें तो अच्छी करेंगे और काम ? बस भगवान ही बचाव? सच ही फलीभूत
होता है,दिखावा ढोंग कितने दिन चलेगा?
तीरथ नहाने से क्या होवे
मन की मैल धुले तो कुछ होवे ।।
तीरथ आजकल तो लोग जाते ही नहीं जाते हैं तो सैरसपाटे के लिये जाते है,और तीरथो में सिवाय तिजारत और
चोर उचक्कों के आज के वक्त में कुछ नहीं सच्चा तीरथ ये है कि सतगुरु का सतसंग कर उनके बचनो को सुने
उनपर अमल करे,परमेश्वर की आराधना करे अपने मन को पवित्र बनावे सतसंग डी सच्चा तीरथ है जिसमें स्नान
करके मन की मल उतर जाती है मन निर्मल हो जाता है।
गुरु चरणों में है बहम तीरथ
कोई हंस आत्मा नहाथै.
आत्मा में निरंकार ज्योति अपने भीतर जो ध्यान लगावै हरिद्वार में कुम्भ के मेले पर साधु स्नान करने पर ऐसे
लडते है कि आपस में बिल्ली भी ऐसे नहीं लड़ती होगी पहले हम नहाने पहले हम.इतनी सी बात पर खून खराबा
कर देते है, जो दूसरों को शान्ति का उपदेस करते हैं,क्रोध ना करने का उपदेस करते है और उनके क्रोध को
समाज को शिक्षा देते है और खुद आचरण से भष्ट बने रहते है वह समाज कभी भी उन्नति नहीं कर पाता आगे नहीं बढ़ पाता।
ग्रन्थ हजार पढ़े क्या होवे
प्रेम के बोल पड़े तो कुछ होवे ।।
लोग अखण्ड पाठ कराते हैं और धर्म ग्रन्थ की एक पंक्ति को भी समझाने की कोशिश नहीं करते अखण्ड
रामायण होती है पढ़ने वालों को भी पता नहीं चलता कि वे क्या पढ़ गये और तीन दिन तक शोर खूब मचा ऐसे
पाठ का क्या लाभ मिलेगा पाठ वो अच्छा जा चाहे कम पढा जावे पर जिसे जीवन में उतार लिया गया हो, वो ही
पाठ श्रेष्ठ है अन्यथा व्यर्थ है । मंदिर जाने से क्या होवै घट भीतर जावै तो कुछ हो ।। मंदिर जाना बुरा नहीं पर वहाँ
जाके अगर महापुरषों के जीवन से कुछ शिक्षा लेवे तो ठीक है नहीं तो जान से क्या फायदा मंदिर में जाके गायत्री
माता की आरती कर रहे हैं और ये नहीं पता कि गायत्री तो ईश्वर आराधना का मंत्र है? ऐसी लकीर पीटने से क्या
लाभ होवेगा? जनम ही खराब करना है?
ढोल पीटने से क्या होवे।
अन्त बखत दखो क्या होवे ।।
बहुत से गुरु अपने चेलों को वहस करना सिखा देते है ओर वे बस इसी को ज्ञान समझने की भूल कर बैठते है
अपने ज्ञान का ढोल पीटते फिरते हैं अपने को उत्तम और दूसरो को व्यर्थ सिद्ध करने में लगे रहते है अन्त में जब
आत्मा परमेश्वर साहिर के -दरबार मे जावेगी और तुम्हारे जीवन भर के कामों को देखा जावेगा तब पता चलेगा
तुम कितने पानी में हो अभी तो दुनिया में अपने मुँह मियाँ मिटू बने फिर हैं अन्त समय में देखना क्या होता है?
पितरों को जल देने से क्या होवै
जिन्दो को सेवा करै तो कुछ होवे ।।
हमारी भारतीय परम्परा है कि पितर पक्षा में अपने मृत पितरों की आत्माओं की शान्ति के लिये प्रार्थना करते है
हमारी भारतीय परम्परा है कि पितर पक्षा में अपने मृत पितरों की आत्माओं की शान्ति के लिये प्रार्थना करते है
भोजन उनके नाम से निकाल कर पक्षियों को डालते हैं,ये हमारी भारतीय परम्परा है हम ये नहीं कहते कि ऐसा
ना करें अपनी परम्पराओं को बनाये रखें पर उससे ज्यादा जरूरी है अपने जीवित माता पिता की सेवा और
देखभाल करें।
पीर सनीचर पूजे क्या होवै
एक में एक होवै तो कुछ होवै ।।
पीर सनीचर की पूजा करते हैं लोग उससे भटकाव ही होता है एक परमात्मा की पूजा ही सच्ची पूजा है उस एक में जो एक हुए वे ही महिमवन्त है वे ही उत्तम पुरूष हैं
जो गली गली मारे मारे फिरते हैं उनको ज्ञान बुद्धि प्रभु ने नहीं दी है अतः वे दुख पाते हैं और जिसे देखो उसे ईश्वर
की तरह मान लेते हैं और बाद में जब उससे मनोकामना पूरी नहीं होती तो उसे गी फेंक कर कोई और पूजा
करते हैं जनम अकारथ करके मर जाते हैं आत्मा में भटकते फिरते हैं एक समझदार को ऐसा नहीं होना चाहिये।
पंण्डत मुल्ला से क्या होवे
गुरु की सेवा करे तो कुछ होवै ।।
कुछ लोग पंण्डतों के और मुल्लों के जाल में ऐसे फंस जाते हैं जैसे जाल में मछली और जनम खराब करते हे गुरु
की सेवा करते तो रास्ता परमेश्वर का मिलता और आत्मा में शान्ति मिलती पर ज्ञान के बिना जीवन नष्ट होता है
आदमी को कुछ भी हासिल नहीं होता ।
लागे तबीज से भला क्या होने
सच्चा मंत्र जपे तो कुछ होवे ।।
कुछ लोग गले में तागे तबीज लटकाये फिरते हैं सोचते हैं कि ताबीज से तुम्हारी मनोकामना पूरी हो
जावेगी दुख संकट से तुम पार हो जाओगे पर ऐसा कुछ नहीं होता उनकी आत्मा कमजोर हो जाती है ये बहमी
बन जाते हैं ,मन से रोगी हो जाते हैं परमेश्वर का मंत्र जपने से आत्मा में उजाला होता है मन में शान्ति और
ज्ञान हृदय में उपजता है ।
नाचने गान से क्या हो अन्तर धुन सुने तो कुछ होवे ।।
कुछ लोग रात भर जगराते में शराब पीके गाते हैं। नाचते हैं अपना और दूसरो का जनम खराब करते है वे भगत
फिर सही बात भी सुनना नहीं चाहते वे आँखा भींच कर परमात्मा को त्याग मन कल्पना से कितनी ही देवियों की
पूजा करते हैं करे मुर्ग भी चढ़ाते हैं पर उनका जनम भी दुख में बीतता है,जब तक परमात्मा की आराधना कराने
वाले गुरू नहीं मिलते तब तक जीव अनेक प्रकार की मूरखताओं को होशयारीमानकर करता रहता है ये काम
ऐसा है जैसे बच्चे बजरी से खेलते है या अठन्नी चवन्नी से खेलते हैं उसे मुंह में दे लेते हैं और वह सिक्का गले में
अटक जाता है जीने मरने की नौबत आ जाती है लोग इसी तरह पाखण्डियों के जाल में ऐसे फंसते हैं और जीवन
भर ऐसे फंसे रहते हैं जैसे जाल में मछली कि बस तड़पते रहते हैं और भरके बाद में परमात्मा की पूजा ना करने
के अपराध में नरक में जाते है और अगला जनम पशु का पाते हैं । अगर भाग से सच्चे गुरू मिलजावे और उनके
चरणों में भक्ति पैदा हो जावे तो वह साधक परमेश्वर का मंत्र जपके तथा शरीर के भीतर जो धुन होती है उसे
सुनते हुए इस आत्मा की जोत को जीते जी परमात्मा के अजर अमर धाम में पहुँचादे और दुनियाँ के बनावटी
पाखण्ड से . छूट कर सच्चे सिरजनहार परमात्मा के प्यार को आत्मा में हासिल कर लेवे पर संसार में फैले
मतलबी और घोर पाखण्डी लोग इसे उधर को चलने देवें तब ना? उन्होंने अपना जाल ऐसा फैलाया है कि बस ?
उसमें से कोई निकल ना पाए
सतपुरुष बाबा फुलरान्दे वाले कहते हैं-संसार में लोग फालतू कामों में ज्यादा ववत्त खोते हैं ना करने के काम
करने में जनम बिता देते हैं सच को जानने की कोशिश नहीं करते और झूठ से पीछे नहीं हटते।
उबरे गाने से क्या होवे
सामगीत गाये तो कुछ होवे ।।
अध्यात्म के नाम पर लोग बेकार के काम अधिक करते हैं कितना भाग्शाली होगा जो मनुष्य जिसके हिस्दै में प्रभु
का प्यार बसा हो,सामवेद जैसी जिसकी वाणी हो जो जीवन के अर्थ को समझे और उस प्रकाश को जगत में
बाँटे भाग्य से ही सतपुरुषों का संग प्राप्त होता है भाग्य से ही सतगुरू मिलते है भाग्य से निर्मल बुद्धि प्राप्त होती है
और भाग्यशाली लोग ही सतकरम करने को आगे बढ़ते हैं अन्यथा संसारिक लोगो का तो अपने स्वारथ के कामों
में लोभ लालच में और गफलत में ही जनम बीतता है।
देस दिसन्तर फिर क्या होवे
गुरूबचन माने तो कुछ होवै।।
एक राजा को बैराग हुआ राजपाट छोड़ वन में चला गया एक ऋषी को देखा और पूछा कि परमात्मा कैसे प्राप्त
होगा ? कैसे मुक्ति होगी। साधु ने कहा-उस सच करतार का नाम जप
कि तू ही सच्चा है जगत झूठा है इतना कहकर वो अपी ध्यान में लीन हो गये राजा ने सांचा इतना तो सब जानते है
कि वो सच्चा है ये भी कोई बात हुई? इस मुनि को कुछ ज्ञान नहीं है कोई अच्छा गुरू देखना चाहिये,
एसा सोचकर देश देसान्तर में तीरथों में यहाँ वहाँ घूमने लगा काशी में एक
पंडित को देखा जो ब्रहमचारियों का विद्या पढाता था सोचा ये विद्वान आदमी है इसकी सेवा में राहके ज्ञान
सीखना चाहिये पंडित ने कहा-मैं किसी से फीस नहीं लेता तुम्हे बदले में कुछ काम
रोज करना पड़ेगा राजा ने जो आप कहोगे वो करूँगा पंडित बोला रोज गोबर के उपले पाथने है ।
राजा को तो अपना वक्त काटना
था सो वह वहाँ रहने लगा रोज विद्या सीसाने लगा.वेद उपनिषद पुराण आदि पढ ने
लगा, इस तरह 12 वर्ष उसे बीत गये,एक दिन पंडित ने राजा को बुलाया कहा-मेरे पास जितनी विद्या थी वो में सब तुम्हें दे चुका अव आखरी उपदेस तुम्हें देता हूँ वह परमात्मा ही सत है जगत सब मिथ्या है इसे मूल मंत्र जानकर इसी का जाप करते हुए कठोर तप करा तब तुम्हें आत्मा में ईश्वर का प्रकाश उदय होगा राजा ने अपना सर पकड़ लिया आज से 12 वर्ष पहले उस ऋषी ने ये ही तो बचन कहें थे पर 12 साल गोबर पाथने के बाद ये बात समझ में आई है।"
जगराते करने से क्या होवै
आत्मा में जागे तो कुछ होवे ।।
लोग माता का जागरण करते हैं अन्ट सन्ट गाने गाते है शराब पीके रात को जागते हैं आत्मा में जय जागरण होगा
तब उस सच्चे करतार का पता लगेगा और उसके लिये निरन्तर सलगुरू का सतसंग परमेश्वर की आराधना संसार से
बैराग और शुभ करमों से प्रीत का होना जरूरी है।
फुलसन्दे वाले बाबा कहते सत्तपुरख प्रम के घर रहते ।।
सतगुरु उपदेस करते हैं कि तेरी आत्मा
पवित्र है तो तू परमेश्वर के संग है वरन तरे घर में ही परमात्मा आके रहने लगता है और संसार के झूट में वह सिरजनहार
कालो दूर हो जाता है सत को धारण करने वाले पुरुष प्रभु परमेश्वर के संग निवास करते है ओर परमेश्वर उनके संग
निवास करता है जिसने मन में सच को बसाया और सच पे जो चला है उसने अपने जनम को सुफल किया है कठिनाई तो
हर एक रास्ते में है पर सच की अग्नि में जो तपे वे कुन्दन हो गये परमेश्वर के प्रिय जन हो गये उन्होंने तत्व को पाया और
अमृत को पाया है।


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