तेरा जिक्र फरिश्ते करते रहे,
पूजा के दीवे जलते रहे
धीरे-धीरे, रात ढलती रही।।
खुली आँखों जो दीखे हैं ये दुनियाँ
ऐसा सपना है मुझे महसूस होता है
फ़कत एक तू ही अपना है
शम्मा बुझ-बुझ के भी जलती रही।।
अ मेरे सतगुरु जब झूम के तेरी याद आती है
हिमालय की हवा दामन को जैसे छू के जाती है
सीने में एक हसरत मचलती रही।।
मुझे लेने तू लेके पालना एक रोज आएगा
ना जाने कौन से दिन आके तू सीने से लगाएगा
तेरी यादों में जिन्दगी ढ़लती रही।।
तुम्हारी याद में मैं अपनी दुनियाँ को भुला बैठा
सिवा फुलसन्दे वालों के, हर एक को मैं भुला बैठा
एक नदी मेरे दिल से निकलती रही।।
युगों-युगों से चला आ रहा हूँ इन रास्तों पे मैं, |
युगों-युगों से चला आ रहा हूँ इन रास्तों पे मैं, |

जन्मों से तुम्हारा हाथ थामे चला आ रहा हूँ इन रास्तों पे मैं
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