सुन प्रभु प्रीतम
sun prabh preetam-st.
सुन प्रभु प्रीतम
ek tu sachcha tera naam sachchaसुन प्रभु प्रीतम
सुन प्रभु प्रीतम लोग कहें ये पागल ग़मों का मारा हैतू ही मेरा माझी है तुहि मेरा किनारा है
सुन प्रभु प्रीतम।
सुन प्रभु प्रीतम
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| satpurush baba fulsande vale |
ज्यो चंदा को रेन प्यारी भोर के पंक्षी प्यारे
ऐसे ही मेरे दिल मे रहते प्रीतम तेरे उजाले
प्रीतम तेरे उजाले मेरी
अब इन आँखों का -2 तू ही तो एक सहारा है
तू ही मेरा मांझी है तू ही मेरा किनारा है
सुन प्रभु प्रीतम।
सुन प्रभु प्रीतम -2
गंधर्व नाचे मेरे आंगन सप्त ऋषि करते गान
अपना तन मन बार के मेने लगाया तेरा ध्यान
लगाया तेरा ध्यान मेरे प्यार की लहरों का -2
तू ही तो एक किनारा है
तू ही मेरा माझी है तू ही मेरा किनारा है
सुन प्रभु प्रीतम। सुन प्रभु प्रीतम ..........3.
फुलसन्दे बाले बाबा मुझ को अपना कहते रहिये
मेरा हाथ पकड़के तू उस रब के घर ले जाइए
अपने घर ले जाइए मुझ को तो चिन्ता ही क्या-2
जब सर पे हाथ तुम्हारा है
तूही मेरा माझी है तू ही मेरा किनारा है
सुन प्रभु प्रीतम। सुन प्रभु प्रीतम
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ek tu sachcha tera naam sachcha
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जो दुनियाँ का गुरू बनता है वह दुनियाँ का गुलाम हो जाता है।
सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं- जो अपने सुख के लिये वस्तुओं की इच्छा करता है, उसको वस्तुओं के अभाव दख भोगना ही पड़ेगा, जिसके भीतर कोई इच्छा नहीं होती उसकी आवश्ययकताओं की पर्ति प्रकति स्वतः करती है, जो सदा हमारे साथ नहीं रहेगा और हम सदा जिसके साथ नहीं रहेंगे उसको प्राप्त करने की इच्छा करना अथवा उससे सुख लेना मूर्खता है, पतन का कारण है । सुख की इच्छा से सुख नहीं मिलता - यह नियम है, चाहे साधु बनो, चाहे गहस्थ बनो, जब तक कुछ पाने की इच्छा रहेगी, तब तक शान्ति नहीं मिल सकती, अगर शान्ति चाहते हो तो यों होना चाहिये, यों होना चाहिये – उसको छोड़ दो और जो परमेश्वर चाहे वही होना चाहिये - इसको स्वीकार कर लो। कामनापर्वक किया गया सब कार्य असत है, उसका फल नाशवान कुछ भी चाहना गुलामी है और कुछ नहीं चाहना आजादी है, वस्तु के न मिलने पर हम अभागे हाह, प्रत्युत परमब्रह्म के अंश होकर भी हम नाशवान वस्तु की इच्छा करते हैं - यही हमारा अभागापन है,संसार कभी साथ नहीं रहता और ईश्वर कभी हमें छोड़ता नहीं ये जान लेना चाहिये, जब तक हम स्वयं को मानते रहेंगे तब तक हम दुखी रहेगे । विचार करें, कामना की पूर्ति होने पर भी हम वही रहते हैं और ना होने पर भी वही रहते हैं फिर पूर्ती से क्या मिला और अपूर्ति से क्या फर्क पड़ा ? जो दुनियाँ का गुरू बनता है वह दुनियाँ का गुलाम हो जाता है और जो अपने आपका गुरू बनता है, वह दुनिया का गुरू हो जाता है, कल्याण प्राप्ति से खुद की लगन काम आती है। खुद की लगन न हो तो गुरू क्या करेगा ? शास्त्र क्या करेगा? जो हमसे कुछ भी चाहता है, वह हमारा गुरू कैसे हो सकता है ? पुत्र और शिष्य को अपने से श्रेष्ठ बनाने का विधान तो है, पर अपना गुलाम बनाने का विधान नहीं है गुरू में मनुष्य बुद्धि करना अपराध है; क्योंकि गुरू तत्व है, शरीर का नाम गुरू नहीं है ।
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satpurush baba fulsande vale


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