सुन यार हमारे सजना
sun yar hamare
ek tu sachcha tera naam sachcha st
**********************सुन यार हमारे सजना
एक बिनती तुझसे करूँ
हे सच्चे साहब तेरी शरण से बिछुड़के मेरा आत्मा दुख पाता है चंचल मति वाला ये जीव किसी हीरन की
तरह काल रूपी सर्प को अपना मित्र मान कर उसके संग रहता है सतगुरु की सीख को नहीं
मानता विषयविकारों के विष को पीता है विष को ही खाता है विष रूप ससार से इसकी पीत हुई है।
प्रभ पुरख निरंजना
एक बिनती तुझसे करूँ।।
******************
एक बिनती सुन स्वामी हमारे
तुझ बिन जीव दुख पावै
बिष पीवै बिष खावै।
मनमोहन मीत पियारे
तेरे बिन जलता फिरूँ ।।
***********************
सुन बिनती प्रभ अलख निरंजन
जबसे बिछड़ा हंस
बन में अगन लगी चारों दिस
जल गये मेरे पंख ।
मनमोहन मीत पियारे
तेरे बिन जलता फिरूँ ।।
**********************
रंग रंगीले मेरी आँखों मे
तेरी ही तस्वीर
तुझ बिन वैद्य नहीं मेरा कोई
कोई ना जानै पीर ।
मनमोहन मीत पियारे
*******************
लालगुलाल सजन तेरी आँखें
तीन लोक कुरबान
कोई तेरे कारण जोगी हो गये
कोई देवै अजान ।
मनमोहन मीत पियारे
तेरे बिन जलता फिरूँ ।।
तेरे बिन जलता फिरूँ।।st
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तेरे बिन जलता फिरूँ।।st
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जीव जगत में हुआ है रोगी
फिरे व्याकुल दिन रात
जुग जुग जिसके घर में बसता
उसी का छूटा साथ
मनमोहन मीत पियारे
तेरे बिन जलता फिरूँ ।।st
प्रभ साहिब तू मेरा
कब आवै मेरा परदेसी
उजड़ा पड़ा घर मेरा।
मनमोहन मीत पियारे
सुन यार हमारे सजना
एक बिनती तुझसे करूँ ।।
प्रभ अलख निरंजना
एक बिनती तुझसे करूँ ।।
सुन यार हमारे सजना
एक बिनती तुझसे करूँ।।
एक बिनती तुझसे करूँ ।।
*********************\
आकाश तारों से भरा था ब्रहम शान्ति में निमग्न सतपुरुष बाबा फुलसन्दे वालों ने
अपने चरणों में शान्त चित बैठे अपने देवआत्मा शिष्यों को इस प्रकार के धर्म उपदेस देना प्रारम्भ किया- हे परमेश्वर की राज में आने वालो सामवेद की ऋचाओं का गायन करने वाले हमारे प्राचीन
ऋषिगण कह रहे हैं-
यदि वीरो अनुध्यादग्नि मिन्धति मतयः
आजुहवत हव्य आनुषक शर्म भक्षीत दैव्यम् ।।
नाशबान शरीर में यदि मनुष्य अविनाशी ईश्वर की उपासना करे और अपने कर्मो को पवित्र बनालेवे
तो उसे कल्याण और दिव्यता की प्राप्ती अवश्य होती है.ये जीव आत्मा रूपी पक्षी उस प्रभु परमेश्वर से
बिछुड़ के दुख अग्नि में जलता फिरता है और जगत की विष लहरों में बहता है,हे अन्तरयामी
परमेश्वर ! मेरी बिनती को सुनो तेरे बिना मेरी आत्मा तेरे बिछोह की आग में जलती फिरती है,
जनम मरण में दुख पाती है,सत करमों के बिना किसी को शान्ति नहीं मिलती किसी को प्रकाश नहीं मिलता।
सुन यार हमारे सजना एक बिनती तुझसे करूँ
प्रभ पुरख निरंजना एक विनती तुझसे करूँ ।
मन मोहन मीत पियारे तेरे बिन जलता फिरूँ।।
*********************\
आकाश तारों से भरा था ब्रहम शान्ति में निमग्न सतपुरुष बाबा फुलसन्दे वालों ने
अपने चरणों में शान्त चित बैठे अपने देवआत्मा शिष्यों को इस प्रकार के धर्म उपदेस देना प्रारम्भ किया- हे परमेश्वर की राज में आने वालो सामवेद की ऋचाओं का गायन करने वाले हमारे प्राचीन
ऋषिगण कह रहे हैं-
यदि वीरो अनुध्यादग्नि मिन्धति मतयः
आजुहवत हव्य आनुषक शर्म भक्षीत दैव्यम् ।।
नाशबान शरीर में यदि मनुष्य अविनाशी ईश्वर की उपासना करे और अपने कर्मो को पवित्र बनालेवे
तो उसे कल्याण और दिव्यता की प्राप्ती अवश्य होती है.ये जीव आत्मा रूपी पक्षी उस प्रभु परमेश्वर से
बिछुड़ के दुख अग्नि में जलता फिरता है और जगत की विष लहरों में बहता है,हे अन्तरयामी
परमेश्वर ! मेरी बिनती को सुनो तेरे बिना मेरी आत्मा तेरे बिछोह की आग में जलती फिरती है,
जनम मरण में दुख पाती है,सत करमों के बिना किसी को शान्ति नहीं मिलती किसी को प्रकाश नहीं मिलता।
सुन यार हमारे सजना एक बिनती तुझसे करूँ
प्रभ पुरख निरंजना एक विनती तुझसे करूँ ।
मन मोहन मीत पियारे तेरे बिन जलता फिरूँ।।
हे परमेश्वर । हे करूणा के सागर । हे देवगणों से आराधित परमब्रह्म । मेरी एक बिनती सुन-
हे आत्माओं के परम मित्र हे प्रभ प्रीतम मेरा जीव आत्मा तेरे उपकार को तेरे अलौकिक प्यार को
भूलकर जगत के मोह पंक में कीचड़ में जा फंसा है,मेरा जीव -आत्मा तेरे दरस को तड़पता है
पर दरस नहीं पाता तू तो मेरी काया में निवास करता है, पर मेरा ध्यान सतपुरुषों की शरण त्याग
जगत की कठोर कँटीली कठोर भूमि पर मुझे लिये भटकता है। मेरा मन कोई पशु है जो ज्ञान भूमि का
त्याग करके अज्ञान के मरूसथलों में तृष्णा और वासनाओं के संग मारा मारा फिरता है।
हे आत्माओं के परम मित्र हे प्रभ प्रीतम मेरा जीव आत्मा तेरे उपकार को तेरे अलौकिक प्यार को
भूलकर जगत के मोह पंक में कीचड़ में जा फंसा है,मेरा जीव -आत्मा तेरे दरस को तड़पता है
पर दरस नहीं पाता तू तो मेरी काया में निवास करता है, पर मेरा ध्यान सतपुरुषों की शरण त्याग
जगत की कठोर कँटीली कठोर भूमि पर मुझे लिये भटकता है। मेरा मन कोई पशु है जो ज्ञान भूमि का
त्याग करके अज्ञान के मरूसथलों में तृष्णा और वासनाओं के संग मारा मारा फिरता है।
एक बिनती सुन स्वामी हमारे तुझ बिन जीव दुख पावे
बस कुरंग संग भुजंग बिस पीवै बिस खावै ।।
बस कुरंग संग भुजंग बिस पीवै बिस खावै ।।
हे सच्चे साहब तेरी शरण से बिछुड़के मेरा आत्मा दुख पाता है चंचल मति वाला ये जीव किसी हीरन की
तरह काल रूपी सर्प को अपना मित्र मान कर उसके संग रहता है सतगुरु की सीख को नहीं
मानता विषयविकारों के विष को पीता है विष को ही खाता है विष रूप ससार से इसकी पीत हुई है।
हीरन को रेगिस्तान में पानी दिखाई देता है उसक पीछे भागते भागते दम तोड़ देता है
ये ही हाल जगत की प्रीत में पड़े इस जीव का है जो सच को त्याग कर झूठ के संग रचा है
और उसी में आसक्त हो गया है उससे निकलना नहीं चाहता।
सुन बिनती प्रभ अलख निरंजन जब से बिछड़ा हंस
बन में आग लगी चारों दिस जल गये मेरे पख ।।
जब से मेरा जीव हस तुझसे बिछड़ा है रात दिन दुख की आग में जलता है
इसके ज्ञान और विवेक रूपी पंख जल गये हैं। गुरु की अज्ञा को ना मान कर
मनुष्य पछताता है और चैन नहीं पाता ।
भगवान शिव कैलाश पर देवी सती के साथ बैठे हैं सती आकाश में उडते
बिमानों को देख कर गणों से पूछती हैं कि ये देवतों के विमान कहाँ जा रहे हैं?
गण बताते हैं तुम्हारे पिता प्रजापति दक्ष ने मान यज्ञ किया हे ये सब वहीं जा रहे हैं
सत्ती ने शिव से कहा-मेरे पिता ने यज्ञ रचा हे हम भी चलें शिब बोले-हमें निमन्त्रण नहीं है
बिना बुलाये जाना ठीक नहीं । सती बोली-अपने घर में बिना बुलाये भी चले जाना चाहिये ।
शिव ने कहा-देवी तुम्हारे पिता मुझसे रुष्ट हैं अत. मुझे नहीं बुलाया अगर हम जानेंगे
तो अपमान होगा तुम भी ना जाओ पर सती ना मानी चे शिव के गणों के साथ चली
गयीं वहाँ जाके क्या देखा कि कोइ भी उनका सत्कार नहीं कर रहा है
सब हंसी उड़ा रहे हैं उन्होंने अपने पिता से पूछा अपने ही जामाता को
तुमने क्यों नहीं बुलाया ? दक्ष बोले वो शम्शान में रहता है अपवित्र जीवन बिताता है
सपेरा है? इस तरह के अपमान भरे बचन जब सती ने सुने तो सहन ना कर सकी जलते यज्ञ
कुण्ड में कूद कर जान देदी । अगर वो पहले ही शिव के बचनो को मान लेती तो शायद ये
दूंघटना ना होती? ऐसा क्यों होता है ? जिसे हम अपना आराध्य समझते हैं उसके भी बचन नहीं मानते
शिष्य ब्रह्म स्वरूप गुरु के बचन नहीं मानते और टुंगति में जाकर गिरते हैं ।
शिव का दूसरा विवाह हिमाचल की पुत्री पारवती से हुआ
एक बार शिव देवी पारवती के संग एकान्त में थे तभी स्वर्ग से कुछ
देवता आये उनमें अग्निदेव भी थे वे उत्तावले होके बोले हम इतनी दूर से आये हैं
और वे एकान्त में हैं? कैसा एकान्त किसका एकान्त?
हमें अभी मिलना है वे पक्षी बनकर महल की खिड़कियों से होते हुए वहाँ पहुँच गये
जहाँ शिव बिराजमान थे पारवती ने उस पक्षी को देखा और जान गयीं स्वर्ग के कोई देवता है,
उन्हें कोध पैदा हुआ कठोर दृष्टि से उन्होंने उस पक्षी को देखा तो उसके पंखा अग्नि से जलने लगे
वह पक्षी अपने असल रूप में सामने आया वे अग्नि देव थे पारवती ने श्राप दिया
तुम लोग देवता अपने को क्या समझते हो? जरा जरा सी मर्यादाओं , को भी तोड़ते हो
मैं तुमको श्राप देती हूँ तुम भक्ष अभक्ष सब कुछ खाने वाले बनो ।
अब तक अग्नि देवताओं को ऋषियों की आहुति पहुँचाया करते थे,
तभी शिव से कुछ ज्योति बिन्दु प्रगट हुए उनको अनि से ग्रहण कर लिया
वे उस ताप को सहन ना कर सके च्याकुल हो गये गंगा तट पर पहुंचे
वहाँ शरद ऋतु में सप्तऋषियों की पत्नियाँ स्नान के बाद ताप रही थीं
अग्नि देव ने वे ज्योति बिन्दु उनको अर्पित कर दिये वे उस तेज को सहन ना कर
सकी उन्होने वो प्रकाश गंगा को दे दिया,
गंगा भी उसे सहन ना कर सकी. वो प्रकाश बहता हुआ किनारे की
झाड़ियों ओर सरकण्डों में जा अटका,
उससे एक तेजस्वी शरीर उत्पन्न हुआ कुमार कार्तिकेय
जो देवताओं के सेनापति हुए और स्वर्ग को असुरों के आधिपत्य से मुक्त कराया
और देवसाम्राज्य की पुनः स्थापना की। कहने का अर्थ ये है कि
देवी सती ने शिव के धर्म बचन ना माने तो यज्ञ कुण्ड में उन्हें जलना पड़ा
और अग्नि देव ने मर्यादा का उल्घन किया शिव के बचन को ना माना तो पक्षी
बनकर पंख जलवाये और बाद में जलते फिरे ऐसे ही जो परमश्वर के मार्ग में तो
आये पर धर्म बचनों को ना माना गुरू के उपदेस को खयाल में ना लाये तो
वे भी पछताते रहे और कोई विशेष लाभ उन्हें परमारथ का ना मिला
बल्की परेशान हुए प्रकाशित वे होते हैं जो धर्म का पालन करते हैं
गुरु आज्ञा में रहके अपनी साधना ओर सेवा को निरन्तर बढ़ाते हैं
ना कि मनमुखों की बातों में आके अपना जीवन और परमारथ ही नष्ट
कर लेते हैं जब सत की राह में आये हो तो सच्चे होके इसमें चलो दूसरों के
अवगुण ना देखो अपनी साधना को बढाओ किसी से उल्झो मत अपना रास्ता बिगाडो मत .
बिगड़े हुओं को ना देखो उनका अनुसरण ना करो उनकी तरह ना बनो
उन्हे देखो जिन्होने जगत में परमेश्वर की प्रसन्नता के लिये काम किये और
अपने जीवन को व अपने समाज को अपने पवित्र कर भो से उच्च बनाया
उन्हीं का जिक्र किया करो उनपर ही अपनी निगाह रखो वैसे ही तुम बनो,
वैसे ही तुम निर्मल कर्म करो महान बनो,महान सोचो महान कार्य करो,
तभी इस जीवन का कुछ फायदा मिलेगा नही तो नहीं
अतः सदा धर्म की राह में ही चले।
रंग रंगीले मेरी आँखों मे तेरी ही तस्वीर
तुझ बिन वैद्य नहीं मेरा कोई कोई ना जाने पीर ।।
हे सच की तरफ ले जान वाले सच्चे सतगुरू तू मेरा वैद्य है
मेरे अवगुणों को दूर करने वाला और मेरी आत्मा में ज्ञान का प्रकाशक है
तेरे बिना मेरी बुरी हालत को दूसरा कोई नहीं जानता।
लाल गुलाल सजन तेरी आँखें तीन लोक कुरबान
कोई तेरे कारण जोगी हो गये कोई देवें अजान ।।
परमात्मा तो एक ही है अपने करमो से आदमी देव और असुर बन जाते हैं
कोई उस परमेश्वर के प्रेम में जोगी हो गये तो कुछ अजान देते फिरते हैं
सतकरम करने वालों को और सारे संसार की भलाई करने वालों को
परमात्मा प्यार करता है,बुरों को नहीं ।
जीव जगत में हुआ है रोगी फिरे व्याकुल दिन रात
जुग जुग जिसके घर में बसता उससे ही छूटा साथ
जीव जगत में रोगी हुआ फिरता है जुगों से जिस प्री के घर में रहता है उसे ही बेगाना
समझ लिया और जगत में मारा मरा फिरता है,सेवा करने से सतरांग करने से
धर्मआचरण करने से ही उसके रोग नष्ट होते हैं,और उसे अमर ज्योति मिलती है।
फुलसन्दे वाले बाबा कहते प्रभ साहिब तू मेरा
कब आयै मेरा परदेसी उजडा पडा घर मेरा ।।
सत्तपुरूष कहते हैं-हे सच्चे प्रीतम परमेश्वर ! तेरे बिन मेरा तन मन आत्मा
और संसार उजड़े घर की तरह वीरान है तू कब मेहेर करेगा?
हे सच्चे प्रीतम परमेश्वर ! तू ताकत दे कि तेरी तरफ आने वालों को तेरा उजाला
पहुँचा सकूँ उनकी हिम्मत बँधा स. हे प्रभु मुझे उजाला दे ताकि ये पवित्र उजाला
तेरी पवित्र आत्माओं में मैं बाँट सकूँ।

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