सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले
सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

जय हो परमेश्वर तेरी जय हो परमेश्वर st. teri jay ho

ek tu sachcha tera naam sachcha

जय हो परमेश्वर तेरी जय हो परमेश्वर

देवता करें तेरी पूजा एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा

हे पारब्रहम परमेश्वर, तेरी जय हो परमेश्वर


तू ही पुरख सनातन, आदपुरख तू ही, प्रभु आदपुरख तू ही तू ही अलख निरंजन 2 दुखभंजन तू ही ऽ ऽ तेरी जय हो .........................................................
इन्द्रम, नेत्रम वरूणं, लाखो नाम तेरे, प्रभु लाखो नाम तेरे तू तो एक ही ईश्वर 2 ह्रदय बसो मेरे ऽऽ तेरी जय हो........................................................
मन्त्र जपे जो तेरा, भब से पार हुआ, प्रभु भव से पार हुआ जिसने करी गुरू सेबा 2 ,घट उजयार हुआ ऽऽ तेरी जय हो.......................................................
पारब्रहम परमेश्वर ,गुरू सेबा से मिलता, प्रभु गुरु सेवा से मिलता तीन लोक नो खण्ड में 2,एक तेरा दीया जलता ऽऽ तेरी जय हो............................................................

33 करोङ़ देवता तेरी पूजा करते, प्रभु तेरी पूजा करते सप्त ऋषि चारों जुग में 2,तेरी वन्दना करते ऽऽ तेरी जय हो............................................................
देवता असुर कोई तेरा, अन्त नही पाते, तेरा अन्त नही पाते फुलसन्दे बाले बाबा 2,तेरी अश्तुति गातेऽऽ तेरी जय हो परमेश्वर
जय हो परमेश्वर, तेरी जय हो परमेश्वर देवता करें तेरी पूजा, एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा हे पारब्रहम परमेश्वर, तेरी जय हो परमेश्वर 2
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सतपुरुष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं - अपने लिये सुख चाहना आसुरी, 
राक्षसी वृत्ति है, जैसे बिना चाहे सांसारिक दख मिलता है, ऐसे ही बिना 
चाहे सुख भी मिलता है अतः साधक सांसारिक सुख की इच्छा कभी
 न करे जैसा मैं चाहूँ वैसा हो जाय यह इच्छा जब तक रहेगी तब तक 
शान्ति नहीं मिल सकती किनारा नहीं मिल सकता। मनुष्य 
समझदार होकर भी उत्पत्ति विनाशशील वस्तुओं को चाहता है,
 यह आश्चर्य की बात है, शरीर में अपनी स्थिति मानने से ही 
नाशवान की इच्छा होती है और इच्छा होने से ही शरीर में
 अपनी स्थिति दृढ होती है, कुछ चाहने से कुछ मिलता है 
और कुछ नहीं मिलता; परन्तु कुछ न चाहने से 
सब कुछ मिलता है। निन्दा इसलिये बुरी लगती
 है कि हम प्रशंसा चाहते हैं, हम प्रशंसा चाहते हैं 
तो वास्तव में हम प्रशंसा के योग्य नहीं हैं,
 क्योंकि जो प्रशंसा के योग्य होता है, 
उसमें प्रशंसा की चाहना नहीं रहती, 
दूसरों से इच्छा रखना बहुत बड़ी
ek tu sachcha tera naam sachcha,satpurush baba fulsande vale



 निर्बलता है, इसलिये अच्छे बनो,
 अच्छे कहलाओ मत, संसारिक सुख
 की इच्छा का त्याग कभी न कभी तो 
करना ही पड़ेगा तो फिर देरी क्यों? जहाँ 
तक बने दूसरों की आपूर्ती का उद्योग करो,
 पर दूसरों से आशा मत रखो गहन ईश्वरीय विचार
 करो, जिससे तुम सुख चाहते हो, क्या वह सर्वथा सुखी है? 
क्या वह दुखी नहीं है? दुखी व्यक्ति आपको सुखी कैसे बना देगा? 
कामना छूटने से जो सुख होता है वह सुख कामना की पूर्ति से कभी 
नहीं होता, परमात्मा की उत्कट अभिलाषा चाहते हो तो संसार की अभिलाषा 
को छोड़ो। जो बदलने वाले हैं संसार की इच्छा करता है, उससे सुख लेता है, 
वह भी बदलता रहता है अर्थात् अनेक योनियों में जन्मता मरता रहता है, जिसको 
हम सदा अपने पास नहीं रख सकते, उसकी इच्छा करने से और उसको पाने से 
भी क्या लाभ ? कामना के कारण ही कमी है, कामना से रहित हो जाने पर कोई 
कमी बाकी नहीं रह जाती, कामना का सर्वथा त्याग कर दें तो आवश्यक वस्तुएँ 
स्वतः प्राप्त होंगी; क्योंकि निष्काम पुरूष के पास आने के लिये सिद्धियां भी लालायित रहती हैं।

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