ज्यादा मत ना सोचा कर मर जावेगा, |
सूख के तू हैड सा हो जावेगा।
सूख के अमचूर सा हो जावेगा।।
सूख के अमचूर सा हो जावेगा।।
लड़ना-झगड़ना चिनचिनाना रोज अफरना छोड़ दे, |
अफरा बीसी मुँह फुलाना गुस्सा करना छोड़ दे।
दुख पावेगा, सूख के तू हैड सा हो जावेगा।।
दुनियाँ का राजा होके भी दुख से नहीं बचेगा |
जो सुमरेगा प्रभू को बस वो ही सुख से रहेगा
हर सुख पावेगा, सूख के तू हैड सा हो जायेगा
हर सुख पावेगा, सूख के तू हैड सा हो जायेगा
नहीं बात किसी की माने तू अकड़-मकड़ नहीं छोड़े |
काल कसाई और यमराज एक दिन तेरा सिर फोड़े
फिर डकरावेगा... सूख के तू हैड ..............।
फुलसन्दे वाले बाबा दिन रात तुझे समझाते
गुरु की जो नहीं सुनते वे नरक में गोते खाते
दुःख उठावेगा सूख के तू हैड..... |
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| satpurush baba fulsande vale |
मेरी निगाह से ऐसे भी कारवा गुजरे,
बगैर खिज्र जो राहों के दरम्या गुजरे।
फकत बहार नहीं उनकी मंजिले मकसूद ,
खि जाँ के दौर से भी अहले गुलिस्ताँ गुजरे।।
प्रभ प्रीतम तेरी उंगलियों में कलम समान मेरा हृदय ।
रहता है व्याकुल हमेशा ना जाने क्यों ये हृदय॥
कल तूने क्या लिखा कल को जाने क्या लिखे।
तेरे हाथ में है कलमजो तू चाहे वो ही लिखे।
फुलसन्दे वाले बाबा कहतेप्रीतम अर्न्तयामी।
मैं तो तेरागुलामहूँ तू मेरा सुल्तान मेरा स्वामी॥
प्राचीन काल में नारद मुनि के समय उच्च कुल में दो भाईयों ने ऋषि प्रव्रज्या धारण की बड़े भाई का नाम सुगत था तो छोटे का नाम था कम्बल | उन दोनों भाईयों के प्रव्रजित हो जाने के बाद उनकी माता साधवी तथा बहन तापना भी प्रव्रजित हो गई थी। एक दिन दोनों भाईयों ने नारद मुनि से पूछा- हे देव ! इस धर्म शासन में प्रव्रजित ऋषि के लिये कितने उत्तरदायित्व हैं ? तो नारद मुनि ने बताया- दो उत्तरदायित्व हैं। उनमें पहला है वेद शास्त्र को कंठस्थ करना और दूसरा है उसके अनुसार साधना ध्यान आदि करते हुए संसार में धर्म का प्रकाश करना । यह सुनकर कम्बल बोला मैं तो साधना और शास्त्र का पूर्ण अभ्यास करूंगा इस प्रकार उसने समग्र वेद शास्त्र कंठस्थ कर लिये और उसके श्रोताओं का बड़ा समूह भी हो गया। जिसके कारण उसका समाजिक लाभ सत्कार और भी बढ़ गया। जो व्यक्ति शास्त्रों को कंथस्थ कर ले, किंतु उसके अनुसार आचरण करे नहीं, तो वह अभिमानी हो जाता है ऐसा ही कम्बल के साथ हुअ वह अपने को पंडित मानने लगा और तर्कों के बल पर उचित को अनुचित तथा अनुचित को उचित सिद्ध करने लगा वह सदोष को निर्दाष और निर्दोष को सदोष करने लगा उसे बड़े बड़े ऋषियों ने समझाया लेकिन उनके परामर्श को उसने परिहास में उड़ा दिया और कहा कि आप लोग क्या जानें आप सभी इस विषय में खाली हो उसके भाई सुगत ने भी बहुत समझाया किंतु उसने एक ना सुनी सुगत ने कहा आयुष्मान! तुम्हें समय आने पर इसका बहुत बड़ा दुष्परिणाम भोगना पड़ेगा परिणाम स्वरूप अन्य सदाचारी ऋषि उससे दूर रहने लगे कम्बल दुराचारी होकर दुराचारियों की संगति करने लगा। एक दिन उसने धर्म आसन पर बैठ कर उपदेश दिया- आयुष्मानों ! यह धर्म तथा विनय कुछ नहीं है मोक्ष धर्म सुनने में न कोई लाभ होता है और न कोई हानि । इस तरह उसने वेद मार्ग को अतिशय हानि पहुंचाई। ब्रह्म पथ में प्रकाशमान नक्षत्र की तरह गमन करने वाला सुगत उस जनम में नंदी ही था और कम्बल उनका भाई था जो आयु के क्षीण होने पर देहपात के बाद अवीचि महानरक में जा गिरा उसकी माँ तथा बहन भी उसके क्रियाकलाप में साथी होने के कारण महानरक में जा गिरीं जिस पुरूष को 5 द्वारों वाली तृष्णा अपने अधीन कर लेती है जो निकृष्ट विषमय फूल फल वाली विषमय परिणाम वाली तथा रूपादि आलंबनों में आसक्त होने के कारण वर्षा ऋतु में बन की घास के समान वृद्धि को प्राप्त होती है जिसके कारण पुरूष के जन्म मरण स्वरूप सांसारिक पोक बढ़ते रहते हैं उस तृष्णा को त्याग कर सबको धर्माचरण करना चाहिए ।।
प्राचीन काल में नारद मुनि के समय उच्च कुल में दो भाईयों ने ऋषि प्रव्रज्या धारण की बड़े भाई का नाम सुगत था तो छोटे का नाम था कम्बल | उन दोनों भाईयों के प्रव्रजित हो जाने के बाद उनकी माता साधवी तथा बहन तापना भी प्रव्रजित हो गई थी। एक दिन दोनों भाईयों ने नारद मुनि से पूछा- हे देव ! इस धर्म शासन में प्रव्रजित ऋषि के लिये कितने उत्तरदायित्व हैं ? तो नारद मुनि ने बताया- दो उत्तरदायित्व हैं। उनमें पहला है वेद शास्त्र को कंठस्थ करना और दूसरा है उसके अनुसार साधना ध्यान आदि करते हुए संसार में धर्म का प्रकाश करना । यह सुनकर कम्बल बोला मैं तो साधना और शास्त्र का पूर्ण अभ्यास करूंगा इस प्रकार उसने समग्र वेद शास्त्र कंठस्थ कर लिये और उसके श्रोताओं का बड़ा समूह भी हो गया। जिसके कारण उसका समाजिक लाभ सत्कार और भी बढ़ गया। जो व्यक्ति शास्त्रों को कंथस्थ कर ले, किंतु उसके अनुसार आचरण करे नहीं, तो वह अभिमानी हो जाता है ऐसा ही कम्बल के साथ हुअ वह अपने को पंडित मानने लगा और तर्कों के बल पर उचित को अनुचित तथा अनुचित को उचित सिद्ध करने लगा वह सदोष को निर्दाष और निर्दोष को सदोष करने लगा उसे बड़े बड़े ऋषियों ने समझाया लेकिन उनके परामर्श को उसने परिहास में उड़ा दिया और कहा कि आप लोग क्या जानें आप सभी इस विषय में खाली हो उसके भाई सुगत ने भी बहुत समझाया किंतु उसने एक ना सुनी सुगत ने कहा आयुष्मान! तुम्हें समय आने पर इसका बहुत बड़ा दुष्परिणाम भोगना पड़ेगा परिणाम स्वरूप अन्य सदाचारी ऋषि उससे दूर रहने लगे कम्बल दुराचारी होकर दुराचारियों की संगति करने लगा। एक दिन उसने धर्म आसन पर बैठ कर उपदेश दिया- आयुष्मानों ! यह धर्म तथा विनय कुछ नहीं है मोक्ष धर्म सुनने में न कोई लाभ होता है और न कोई हानि । इस तरह उसने वेद मार्ग को अतिशय हानि पहुंचाई। ब्रह्म पथ में प्रकाशमान नक्षत्र की तरह गमन करने वाला सुगत उस जनम में नंदी ही था और कम्बल उनका भाई था जो आयु के क्षीण होने पर देहपात के बाद अवीचि महानरक में जा गिरा उसकी माँ तथा बहन भी उसके क्रियाकलाप में साथी होने के कारण महानरक में जा गिरीं जिस पुरूष को 5 द्वारों वाली तृष्णा अपने अधीन कर लेती है जो निकृष्ट विषमय फूल फल वाली विषमय परिणाम वाली तथा रूपादि आलंबनों में आसक्त होने के कारण वर्षा ऋतु में बन की घास के समान वृद्धि को प्राप्त होती है जिसके कारण पुरूष के जन्म मरण स्वरूप सांसारिक पोक बढ़ते रहते हैं उस तृष्णा को त्याग कर सबको धर्माचरण करना चाहिए ।।


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