काया के अन्धेरे पिंजरे मे -
kaya ke adhere pijare men ||
ek tu sachcha tera naam sachcha
इस तकदीर के लेख को मेट सके,कोय
पार ब्रह्म का सुमरन करिये गुरु बिन मुक्ति ना होय
गुरू ही देते जीव को जनम मरण का ज्ञान |
जैसा करेगा बैसा भरेगा तेरा करम तेरे आगे चलेगा
फुल कहाँ से पायेगा जिसने है कांटे बोय
अहरन की चोरी करै,करै सुई का दान
कोठे पे चढ़के देखता कितनी दूर विमान
खाली हाथ चला मुसाफिर भर-भर आँखे रोय
पार ब्रह्म का सुमरन करिये गुरु विन मुक्ति ना होये
(राग -आसावरी)
( सा, रे, गा, धा, पा) .
तू मालिकं सारे जग का सच्चा तेरा नाम
जिस दिल में तेरा चान्दना वो जग में सुल्तान
(राग -आसावरी)
( सा, रे, गा, धा, पा) .
तू मालिकं सारे जग का सच्चा तेरा नाम
जिस दिल में तेरा चान्दना वो जग में सुल्तान
एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा-२
काया के अन्धेरे पिंजरे मे, तेरे सुमरन से है चाँदना
मेरी आत्मा है तेरा सिंहासन होवे झिलमिल-झिलमिल चॉदना.
एक दिन मैं तेरा नूर था, फिर एक दिन तुझसे दूर हुआ
एक दिन मैं तेरा नूर था, फिर एक दिन तुझसे दूर हुआ
तेरे दर पे करता था आराधना,फिर दुनियां में आके धूल हुआ.
काया के अन्धरे पिजरे में ..... •
काया के अन्धरे पिजरे में ..... •
सबसे ऊँचा है तखत तेरा , हे पार ब्रह्म महाराज
तेरी आरती करते देवता, हे राजो के महाराज -
तेरी आरती करते देवता, हे राजो के महाराज -
काया के अंधेरे पिंजरे मै .............!
कुछ कमी नहीं है फूलों की, हे परमेश्वर तेरे गुलशन में
कुछ कमी नहीं है फूलों की, हे परमेश्वर तेरे गुलशन में
ये मेरे नसीब की बात हैं, काटें हैं भरे मेरे दामन में
काया के अंधेरे पिंजरे में ........... ।
भव सागर की लहरों में खड़ा, मैं ढूढं रहा तेरा रास्ता
एक बूंद रोशनी की देओं, देओ मुक्ति का रास्ता
काया के अंधेरे पिंजरे में
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लेखक एवं गायक
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| satpurush baba fulsande vale |
गुरू ही देते जीव को जनम मरण का ज्ञान |
इस लिये कीजये सदा गुरू का सम्मान ॥
गुरु के बिना कोई ना जाने क्या है परमात्मा ।
गुरू के ज्ञान का पान करके जागती आत्मा
फुलसन्दे वाले बाबा कहते गुरू ही ब्रह्म दिखावै ।
खोजी हो तो अपने ही भीतर परमात्म पावै ।।
गुरूसे बढ़कर कुछ नहीं
शरीरमिन्द्रियप्राणमर्थस्वजनबान्धवान् ।
गुरूसे बढ़कर कुछ नहीं
शरीरमिन्द्रियप्राणमर्थस्वजनबान्धवान् ।
आत्मदारादिकं सर्व सदगुरूभ्यो निवेदयेत् ॥
अपने शरीर इन्द्रिय प्राण धन कुटुम्बीजन नाते रिश्तेदार आदि किसी को भी गुरूसे बढ़कर नहीं समझना चाहिए । जब कोई साधक आत्मज्ञान की प्राप्ती हेतु अपना सर्वस्व गुरू को समर्पित कर देता है तो फिर उसका शरीर इन्द्रियाँ प्राण धन कुटुम्बीजन एवं अपने नाते रिश्तेदारों से भी उसका कोई सम्बन्ध नहीं रहता यदि वह इस ज्ञान की प्राप्ती के लिये सच्चे गुरू से दीक्षा लेकर सन्यास ग्रहण कर लेता है तो उसका नाम गोत्र आदि भी बदल जाता है अपने पुराने सम्बन्धों से उसका कोई सम्बन्ध नहीं रहता फिर उसे अपनी गुरू परम्परा के अनुसार ही चलना पड़ता है, ऐसा समर्पण होने पर ही वह इसका योग्य पात्र माना जाता है कि वह ईश्वरीय ज्ञान को पा सके संसार के प्रति आसक्ति का त्याग ही ज्ञान प्राप्ति का प्रथम चरण है ।
सर्वजुतिशिरोरत्नविराजितपदाम्बुजम् ।
वेदान्तार्थप्रवक्तारं तस्मात्संपूजयेद् गुरूम् ॥
गुरू सर्व श्रुति रूप यानि वेदों का रूप हैं श्रेष्ठ रत्नों से सुशोभित चरण कमल वाले हैं और वेदान्त के अर्थों के प्रवक्ता हैं इसलिए श्री गुरू की अवश्य पूजा करनी चाहिए, ज्ञान का प्रदाता गुरू सर्वश्रुतियों से सम्पन्न होता है, वह उनका ज्ञाता तथा उसके अर्थों का सही विश्लेषण करने वाला होता है, वेदान्तो की सही व्याख्या करने वाला होता है आत्मा में ब्रह्म को दर्शाने वाला होता है वह मात्र विद्वान ही नहीं स्वयं ज्ञान प्राप्त किया हुआ होता है, शिष्य ने पूछा गुरूदेव मेरे पुण्य कैस बढ़ेंगे? गुरू ने कहा हर वक्त परमेश्वर का सुमरन कर शिष्य ने कहा- यदि और जल्दी ज्यादा पुण्य बढ़ाने हों तो? गुरू ने कहा तो रात में उठकर ढोल बजा लोगों को परमेश्वर के मार्ग पर लगा, तुझे अनन्त पुण्य की प्राप्ती होगी, कुछ तुझे बुरा कहेंगे कुछ धर्म मार्ग में लग जावेंगे, स्वयं धर्म मार्ग में अटल रहना व दूसरों को अटल रखना, इससे बढ़कर उपाय महान पुण्य और ईश्वर की ज्याति
को प्राप्त करने का और कुछ उपाय नहीं है ।
को प्राप्त करने का और कुछ उपाय नहीं है ।


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