कुण्डलिनी का जागरण
-kundalni jagaran-
mukti ka rasta
धर्म आचरण क्या है सुनो वो है परमेश्वर की आराधना।
गुरू का अनुसरण करो होवे हृदय चाँदना।।
गुरू कहें जिस तरहा वो बचन तुम मानो ।
गुरू शरीर में पारब्रह्म को चाँदनातुम जानो।।
फुलसन्दे वाले बाबा कहते सांस सांस सुमरन करो।
पारब्रह्म के मंत्र से जीवन को रोशन करो।
भक्तिवान पुरूष
परमब्रह्म के ध्यान में स्थित हुए सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं
तरत् स मन्दीधावतिधारा सुतस्यान्धसः।
तरत् स मन्दीधावति|| ऋ0 1 | 57 | 1, ऋषि:- वत्सार:।।
देवता- पवमान: सोम:|| छन्द:-निजूदगायत्री।
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| ek tu sachcha tera naam sachcha |
हे दुख और पाप से तरना चाहने वालो ! देखो, कितने ही हैं ? जो कि इस संसार सागर से तर गये । इस दुस्तर दीखने वाले संसार महासागर से तरा जा सकता है- सचमुच तरा जा सकता है, परन्तु तरता वह है जो परमपुरूष परमात्मा से प्यार करने वाला है। क्या तुम उसकी भक्ति स्तुति में रमने वाले हो ? क्या इस सुमरन आराधना रस से तुम्हारा अन्तःकरण तृप्त हो गया है ? क्या तुम्हारा अपना अन्तर अन्तः आनन्द से परिपूर्ण हो गया है ? अर्थात् तृप्त होकर तुम्हें अब संसार की अन्य किसी वस्तु की कामना नहीं रही है ? क्या तुम ऐसे मस्त हो गये हो? ऐसे आत्माराम हो गये हो ? मस्त होने के लक्षण तो ये ही हैं। देखो, ऐसे मस्त तरते जा रहे हैं और तर गये हैं। यह अवस्था कैसे प्राप्त होती है ? जब उपासना करने से अन्दर सोई पड़ी हुई शक्ति जागती है तो वह प्राण, वाणी और मन को उज्जीवित करती हुई ऊपर की ओर चढ़ने लगती है। हठ-योगियों की परिभाषा में इसे कुण्डलिनी का जागरण और प्राणोत्थान कहते हैं। इस कुण्डलिनी का वास्तविक जागरण ही तरना शुरू करना है। प्राण की धारा मूलाधार से उठकर ऊपर चढ़ने लगती है, हेमवती शक्ति नाचती कूदती हुई,उस पुरूष ब्रह्म की स्तुति करती हुई उत्तर मार्ग में प्राण, वाणी, मन के अद्भुत चमत्कार दिखाती हुई ऊपर, अपने परमब्रह्म रूप स्वामी की
ओर चढ़ने लगती है। यह आध्यान अर्थात् मानसिक चेतना से युक्त प्राणधारा के रूप में क्रमशः ऊपर जाती हुई अनुभूत होती है। यही उत्पन्न किये अमृत सोम की धारा है जिसके साथ साथ आत्मा ऊँचा होता जाता है। इसी धारा के साथ प्रकाशित आत्मा वाला साधक ऊर्ध्वगति को प्राप्त होता है। प्रसिद्ध आध्यात्मिक सात लोक अन्दर ही हैं । उन्नत होता हुआ आत्मा इन सब लोकों को पार करता हुआ परमात्मा के सत्यलोक में पहुंचकर पूर्ण स्वतन्त्र हो जाता है। बिल्कुल पार उतर जाता है। प्राण, वाणी , मन आदि शक्तियां शिर के सहस्त्रसार सत्यलोक में जाकर ठहर जाती हैं और समाधि सिद्ध हो जाती है।
शब्दार्थ- मन्दी-जो भक्ति स्तुति करने वाला, स्वयं तृप्त, आनन्दमग्र पुरूष होता है स:वह तर जाता है


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