सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले
सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

मैंने तो फूल बोए थे-maine to phool boye the

मेरे दिल में सतगुरु तेरा दिया

आँधियों के बीच में भी जलता रहा।।
संसार सागर है तू है किनारा
जैसे कहीं अम्बर में चमके सितारा
मैं जल की मछली जल में ही प्यासी
हे मेरे सतगुरु हे अविनाशी
सत्पुरुष बाबा फुलसन्दे वाले
दामन में मेरे भर दो उजाले।।
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ek tu sachcha tera naam sachcha
satpuush baba fulsande vale 

मैंने तो फूल बोए थे तेरी चाह में

काँटे कोई बखेर गया मेरी राह में।
वो खुश रहे जो हमको गम देते हैं रात-दिन
मेरा तो सर झुका है तेरे आगे रात-दिन।।
कितना ही अंधेरा हो मेरी राह में प्रभू
भटकूँ ना तेरी राह से हे मेरे प्रभू ।।
एक बुझी शम्मा की तरह था ये दिल मेरा
देवता की आरती का बन गया दिया।।
इल्तजा यही है दिले. बेकरार की |
तोड़ना ना डोर कभी मेरे प्यार की।।
कभी बेकसों को देख जरा आसमान से
कितनी मिली हैं ठोकरें तेरे जहान से।।।
फुलसन्दे में बैठा हूँ तेरा दीवा बाल के
टूटे हुए इस दिल को जतन से संभाल के।।
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अपने दिल को बुराई से हटाकर
उस मालिक की तरफ को फिराओ।


मनो बुद्धय हंकार चित्तानि नाहं न च श्रोत्र जिहवे न घ्राण नेत्रे।

न च व्योम भूमि न तेजो न वायु: ।

चिदानंदरूपः शिवोहम शिवोहम्॥

ना मैं मन बुद्धि ना चित हंकार हूँ ।

ना कान जीभ ना नासिका हूँ |

ना नेत्र ना व्योम ना भूमि

ना अग्नि ना वायु ना पंचतत्व हूँ ।

मैं तो मंगलकारी शिव हूँ ।

परमात्मा हूँ । मंगलकारी परमात्मा हूँ ।

                                       मुनीति सिद्ध

सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं-शिव के प्रमुख सेवक नंदी एक पूरी रात खुले आकाश में बैठे साधना करते रहे अतिशीत से उनको प्रातःकाल में ज्वर यानि बुखार हो गया वे शीत से काँप रहे थे। शिव वहाँ आये कहा नंदी ये क्या? ये भी कोई साधना है ? इस शरीर को अति कष्ट देने से कोई ब्रह्म प्राप्ति नहीं हो जाती। साधना में भी ज्ञान पूर्वक साधना करने पर ही साधक पूर्णता को प्राप्त करता है। 52 कल्प पहले तुम मुनीति नाम के सिद्ध हुए उस वृतान्त को सुनो वह मुनीति एक सिद्ध आश्रम में दीक्षित होकर उन सबसे दूर जाकर एकान्त में साधना करने लगा मनुष्यों को देखते ही वह बन में मृग की तरह भाग जाता। महा विकट आहार करता बछड़े का गोबर खाता कभी वृक्ष के पत्ते खाता। अप्रमाद युक्त वो एक भयंकर बन में वह प्रवेश कर गया। वर्षा और बर्फ पड़ते समय उसमें वो भीगता रहता। रात को खुले आकाश तले बैठ जाता। दिन में सूर्य के निकलने पर सूर्य की धूप न तपता फिर शीत छाया में चला जाता वृक्षों से टपकते ओस



और जल के नीचे दिन भर बैठा रहता इस प्रकार वह अपने शरीर को सदा कष्ट देता रहता। रात दिन सर्दी शीत के दुख को वो सहता रहता। गर्मी के दिनो में भयंकर सूर्य के ताप को तो कभी दोपहर में आग जलाकर बैठा रहता रात में वायु रहित स्थान में शरीर से पसीना बहाता रहता। ओढ़ने बिछाने को कभी वस्त्र न लेता ऐसे ही पशुओं की तरह पृथ्वी पर पड़ा रहता, नग्न घूमता रहता। इस तरह वह ब्रह्म पथ को खोज रहा था, ब्रह्मचर्य में स्वयं को स्थापित कर रहा था, मृत्यु के समय उसको भयंकर नरक का दृश्य दिखाई पड़ा तब उसे ज्ञात हुआ कि तूने जो ये अतिव्रत किया है ये निर्थक था, उसने मन से उस साधना का त्याग कर दिया तथा देवलोक में जाकर पैदा हुआ, उसके पश्चात बहुत जनम बाद पुनः पृथ्वी की तरफ को उसका जीव आत्मा उतरा । वह मुनीति सिद्ध हे नंदी तुम ही थे। व्यक्ति को कभी भी अतिवाद में नहीं पड़ना चाहिए, जो शिव जैसे गुरू के घर में हैं उनके लिए केवल गुरूपूजा, गुरू सेवा, गुरू आज्ञा, और गुरू के प्रेम से बढ़कर अन्य कोई कर्तव्य नहीं होता अतः इस अतिवाद में तुमको नहीं पड़ना चाहिए। नंदी ने शिव के चरणों में मस्तक रख दिया कहा क्षमा करें देव आगे से ऐसा नहीं होगा।

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