मैं हूँ घोर अँधेरा-
me hu ghor adhera
मैं हूँ घोर अँधेरा, तुम हो मेरा सवेरातुम ही तुम समाये हुए हो, मेरी आँखों में मेरी साँसों में
ये चाँद-सितारे कुदरत के नजारे, तुम ही तुम समाये हुए हो
मेरी आँखों में मेरी साँसों में।।
तेरी आराधना देवता करते, झिलमिल चाँदना होवे गगन में
तेरी अस्तुती करते फरिश्ते, गगन से चाँदना आवे मेरे मन में
महके है तू ही तन-मन में।।
ख्वाब की तरहा है ये दुनियाँ, आज नहीं तो कल मिट जायेगी
लेकिन मेरी आत्मा हे प्रभु, जनम-जनम तेरे गुण गायेगी
तुझमें ही लहरायेगी।।
एक नदिया के हैं दो किनारे, एक यहाँ और एक वहाँ है
तुम तो मेरे दिल में समाये एक और दो की बात कहाँ है
तू ही यहाँ है-वहाँ है।।
फुलसन्दे वाले बाबा बता दो, जनम-मरण का अन्त कहाँ है
जहाँ तेरे चरण हैं, हे मेरे सतगुरु, मेरे मन का बसंत वहाँ है
आदि अन्त वहाँ है।।
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| satpurush baba fulsande vale |
कोई काबे से पहुँचे तो कोई दैर से पहुँचे,
जिनपे थी नज़र तेरी, वो ही खैर से पहुंचे।
माना, के तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं,
मगर ऐसी बे-रुखी क्या जो सलाम तक ना पहुंचे।
एक भी बात आगे बोलनी अब बेकार है।
मेरे होठों से छलता केवल तेरा प्यार है।
रात दिन मेरे होठों पे उजाला तैरता है।
या मेरी रूह पर तेरा खयाल तैरता है।
फुलसन्दे वाले बाबा कहते तू है
मेरा हमनशीं । तू अनन्त आकाश है मैं जरा सी जमीं॥
महानद नाम का हाथी
सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं-ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर शिव वर्षाकाल में अकेले ही महा एकान्त में निवास कर रहे थे नन्दी उस समय शिव आज्ञा से दूसरी गुफा में थे सभी गण इधर उधर ग्रामों में वर्षाकाल बिता रह थे 2 महीने बाद कुछ शिवगण महादेव के दर्शन करने नन्दी की गुफा में पहुँचे कहा नन्दी हम शिव के दर्शन करना चाहते हैं। नंदी ने सोचा महादेव बहुत समय से एकांत वास कर रहे हैं अतः ऐसी स्थिति में अचानक इतने लोगों को लेकर उनके सम्मुख पहुंचना उपयुक्त न होगा। यह सोचकर वे अकेले ही शिव की सेवा में पहुंचे। उस समय महानद नाम का हाथी शिव की सेवा में था, वो ही उनके सारे कार्य किया करता था, नंदी को देखते ही वह सूंड में एक दंड उठाकर उनकी ओर दौड़ा। यह देखकर शिव ने उसे रोक दिया कहा इसको आने से मत रोको यह मेरा सेवक है, तब गजराज दंड फेंककर नंदी का पात्र और वस्त्र लेने को आगे बढ़ा किंतु नंदी ने उसे नहीं दिया तब हस्तीराज सोचने लगा यदि यह गण उच्च आचरण वाला है तो शिव के विराजमान होने के पाषाणस्थल पर अपना समान नहीं रखेगा। इधर नंदी ने भी अपना पात्र और वस्त्र भूमि पर ही रख दिया। परंपरागत शिवगण अपने उपयोग का पात्र चीवर आदि सामान गुरू के आसन में या शय्या पर नहीं रखा करते । नंदी प्रणाम कर बैठ गये, शिव ने पूछा अकेले ही आये हो? उसने कहा नहीं प्रभु 11 गण भी साथ हैं आपकी आज्ञा लेने आया हूँ आज्ञा पाकर वह सबको बुला लाये सबने दर्शन किये सब आनन्द विभोर हो गये गणों ने कहा- प्रभु ! आपने अकेले रहकर बड़ा दुष्कर कार्य किया है जान पड़ता है यहां सेवा टहल भी करने वाला कोई न था शिव ने कहा- गणों! इस हाथी ने ही इस अवधी में मेरी सेवा की है अत: ऐसा बुद्धिमान पशु साथी मिल जाय तो वह मूर्ख मनुष्य से भी उत्तम है ऐसा एकांतवास भी सुखदायक ही होता है, परंतु यदि साधक को गुण सम्पन्न सहायक नहीं मिले तो वह जैसे कोई राजा अपने हारे हुए राष्ट्र को छोड़कर एकाकी विचरता है वैसे ही वो एकाकी ही विचरण करे साधना करे पर मूर्ख हठी जिद्दी और अड़यल मनुष्य का कभी संग कभी ना करे अन्यथा उगे उमरव के स्थान पर महाशोक और दुख की ही प्राप्ति होती है।
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2 Comments
Ek tu sachcha Tera naam sachcha
ReplyDeleteएक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा 🙏🏻
Deleteआपका हम स्वागत करते है