मेरे मन के हंस उड़ गये दूर गगन में
चुगते हैं मोती, तेरे चमन में।।
सुनो सतगुरु आवे अम्बर से चाँदनादेवता फूल बिखरावें मेरे आँगना।।
तेरे परिधानों में, स्वर्ग की खुशबू
कहाँ-कहाँ मुझे लिए फिरे तेरी खुशबू ।।।
तुम हो तो सतगुरु मुझे क्या कमी है
फुलसन्दे वालो तुमसा दूसरा नहीं है।।
परमेश्वर तेरा नाम लिखा है मैं ने इस दिल में
तेरा जिक्र होवे है सुल्तान फ़रिश्तों की महफिल में
सूरज-चन्दा नौलख तारे तेरी आरती करते हैं।
दीपक की तरहा प्राण मेरे तेरी आरती में बलते हैं
तू है अलख-पुरख भगवान-लिखा है
मैंने इस दिल में विनय नहीं भगती नहीं, नहीं मुझे आतम ज्ञान
कैसे निभाओगे मुझे सतगुरु साहिब मेहरबान
तेरा नाम मेरे मेहरबान लिखा है मैंने इस दिल में
कहें बाबा फुलसन्दे वाले. घर बैठे प्रभु पाया
तेरी किरपा जिसपे होवे उसपे करे जग छावा
अरे तेरी प्रीत का बाण लगा है मेरे इस दिल में ।।
कैसे निभाओगे मुझे सतगुरु साहिब मेहरबान
तेरा नाम मेरे मेहरबान लिखा है मैंने इस दिल में
कहें बाबा फुलसन्दे वाले. घर बैठे प्रभु पाया
तेरी किरपा जिसपे होवे उसपे करे जग छावा
अरे तेरी प्रीत का बाण लगा है मेरे इस दिल में ।।
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satpurush baba fulsandevale |
सौ बार कहा दिल ने उसको बढ़के चूमले।
सौ बार किसी ने पैरों में जंजीर डाल दी॥
सौ बार तेरे उत्तरपथ पर दौड़ा देह रथ।
मृत्यु के देवता ने पहिये की कील निकाल दी।
फुलसन्दे वाले बाबा कहें तू देखता तो सब है।
रहता है चुपचाप इसी लिए तू रब है ।
सिद्ध अनगार
सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं-अनगार के घर के आगे सदा रात दिन सदाव्रत लगा रहता वह और उसकी पत्नी भूखे गरीब तथा साधुओं को भोजन कराने में लगे रहते उस अक्षयपात्र से भोजन कभी समाप्त होता ही नहीं था। उसकी प्रसिद्धि से चिढ़ कर एक योगी उसके पास आया कहा मैं तुमको बताता हूँ कि योगी कहते किसे हैं तुमने बेकार में लोगों को भ्रमित कर रखा है ? क्या तुम कोई सिद्ध पुरूष हो? उस योगी ने अनगार से पूछा अनगार ने कहा नहीं प्रभु मैं तो तुच्छ सा एक साधारण व्यक्ति हूँ मैं कुछ भी नहीं जानता ये सब परमेश्वर की असीम कृपा है जो मैं आपकी सेवा करने का सौभाग्य पा रहा हूँ | पर वो योगी उसके यश से चिढ़ा हुआ था उसने अनगार को कहा ले ये मेरी लाठी मेरे सिर में जोर से मार तुझे पता चलेगा योगी कहते किसे हैं ? अनगार ने हाथ जोड़े प्रभु आप मेरे अतिथि हैं भोजन कीजये मुझे इतनी कठिन आज्ञा मत दीजये बार बार योगी के जिद करने पर अनगार ने योगी का डण्डा उसके सिर पर मारा टन्न से आवाज हुई जैसे वह डण्डा किसी कठोर चट्टान से टकरा गया हो। फिर योगी ने कहा ला अब मैं तेरे मारके देखता हूँ | अनगार ने कहा प्रभु मेरे तो टुकड़े टुकड़े हो जाएंगे पर यदि आप मारना ही चाहते हैं तो बस धीरे से छुआ दो मैं सहन नहीं कर सकता। योगी ने धीरे से वो डण्डा अनगार के सिर पर मारा पर योगी अचरज में रह गया डण्डा ऐसे चला जैसे हवा में चल रहा हो वह उसके शरीर के आरपार निकल कर पृथ्वी पर जा पड़ा योगी आश्चर्य से देखता रह गया बोला ये सब क्या है ? अनगार ने हाथ जोड़े कहा प्रभु मैं नहीं जानता ये क्या है ? आप मुझ पर क्रोध ना करें मुझे क्षमा करें मेरी सेवा स्वीकर करें आप भोजन करें और शान्त हो जावें उसी राज्य के राजा ने बहुत ही आलीशान एक मंदिर बनवाया था जिस सुभा मंदिर में प्रवेश होना था रात्री में ईश्वर ने राजा को दर्शन देकर कहा राजा मैं कल तुम्हारे मंदिर में नहीं आ सकता कल मुझे अनगार के मंदिर में जाना है तुम भी चाहो तो वहीं आ जाना। राजा को जागने पर बड़ा अचरज हुआ वह सुभा होते ही अनगार के यहाँ दौड़ पड़ा उसने पूछा अनगार तुम्हारा मंदिर कहाँ है ? उसने हाथ जोड़ दिया कहा देव ! मैने कोई मंदिर नहीं बनाया केवल अपने हृदय को ही परमेश्वर का मंदिर बना रखा है राजा ने झुक कर उसके चरणों की धूल को अपने माथे से लगा लिया। ये अनगार ही उस जनम में शिव का शिष्य नंदी था ।
सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं-अनगार के घर के आगे सदा रात दिन सदाव्रत लगा रहता वह और उसकी पत्नी भूखे गरीब तथा साधुओं को भोजन कराने में लगे रहते उस अक्षयपात्र से भोजन कभी समाप्त होता ही नहीं था। उसकी प्रसिद्धि से चिढ़ कर एक योगी उसके पास आया कहा मैं तुमको बताता हूँ कि योगी कहते किसे हैं तुमने बेकार में लोगों को भ्रमित कर रखा है ? क्या तुम कोई सिद्ध पुरूष हो? उस योगी ने अनगार से पूछा अनगार ने कहा नहीं प्रभु मैं तो तुच्छ सा एक साधारण व्यक्ति हूँ मैं कुछ भी नहीं जानता ये सब परमेश्वर की असीम कृपा है जो मैं आपकी सेवा करने का सौभाग्य पा रहा हूँ | पर वो योगी उसके यश से चिढ़ा हुआ था उसने अनगार को कहा ले ये मेरी लाठी मेरे सिर में जोर से मार तुझे पता चलेगा योगी कहते किसे हैं ? अनगार ने हाथ जोड़े प्रभु आप मेरे अतिथि हैं भोजन कीजये मुझे इतनी कठिन आज्ञा मत दीजये बार बार योगी के जिद करने पर अनगार ने योगी का डण्डा उसके सिर पर मारा टन्न से आवाज हुई जैसे वह डण्डा किसी कठोर चट्टान से टकरा गया हो। फिर योगी ने कहा ला अब मैं तेरे मारके देखता हूँ | अनगार ने कहा प्रभु मेरे तो टुकड़े टुकड़े हो जाएंगे पर यदि आप मारना ही चाहते हैं तो बस धीरे से छुआ दो मैं सहन नहीं कर सकता। योगी ने धीरे से वो डण्डा अनगार के सिर पर मारा पर योगी अचरज में रह गया डण्डा ऐसे चला जैसे हवा में चल रहा हो वह उसके शरीर के आरपार निकल कर पृथ्वी पर जा पड़ा योगी आश्चर्य से देखता रह गया बोला ये सब क्या है ? अनगार ने हाथ जोड़े कहा प्रभु मैं नहीं जानता ये क्या है ? आप मुझ पर क्रोध ना करें मुझे क्षमा करें मेरी सेवा स्वीकर करें आप भोजन करें और शान्त हो जावें उसी राज्य के राजा ने बहुत ही आलीशान एक मंदिर बनवाया था जिस सुभा मंदिर में प्रवेश होना था रात्री में ईश्वर ने राजा को दर्शन देकर कहा राजा मैं कल तुम्हारे मंदिर में नहीं आ सकता कल मुझे अनगार के मंदिर में जाना है तुम भी चाहो तो वहीं आ जाना। राजा को जागने पर बड़ा अचरज हुआ वह सुभा होते ही अनगार के यहाँ दौड़ पड़ा उसने पूछा अनगार तुम्हारा मंदिर कहाँ है ? उसने हाथ जोड़ दिया कहा देव ! मैने कोई मंदिर नहीं बनाया केवल अपने हृदय को ही परमेश्वर का मंदिर बना रखा है राजा ने झुक कर उसके चरणों की धूल को अपने माथे से लगा लिया। ये अनगार ही उस जनम में शिव का शिष्य नंदी था ।


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