मुक्ति का रास्ता
mukti ka rasta
ek tu sachcha tera naam sachcha
संगत के नाम संदेश
ओम परमात्मने नमः, श्री परमात्मनः आज्ञया, श्रीश्वेतवाराह कल्पे, वैवस्वत्मन्वन्तरे, अष्टाविंशति समे, कलयुगे, कलि प्रथम चरणे, जम्बूद्वीपे, भरतखण्डे, भारतवर्षे, आर्यावर्तेक देशे, पुण्यकक्षेत्रे फुलसन्दा ग्रामे, 2077 सम्वतसरे, बैशाख मासे शुक्लपक्षे,अष्टमीतिथी, शुक्रवासरे, 1 मई 2020 आश्लेशा नक्षत्रे, सेल सालवाहन गोत्रेत् उत्पन्न सतपुरुष बाबा फुलअशश्वतसन्दे वाले नाम्ना राष्ट्रहितार्थे सर्वजनेभ्य: संदेशयति-
महादेव शिव के शिष्य नन्दी और नन्दी के शिष्य थिरूमूल ने 7 करोड़ युगों तक अपने दिव्य शरीर को जगत कल्याण के लिये धारण किये रखा वे काकभुशण्डी लोमशऋषि कुमार कार्तिकेय आदि की परम्परा के ऋषि हैं, जो आज भी पृथ्वीतल पर बिराजमान रहकर पवित्र आत्माओं का मार्गदर्शन करते रहते हैं 11 दिसम्बर शुक्रवार अघन अमावस्या को मेरूपर्वत पर होने वाली ऋषि सभा में नन्दीश्वर ने ये बचन कहे-ऋषियों ! जो परमानन्द मैने प्राप्त किया संसार भी उसे प्राप्त करे ये मेरी अभिलाषा है, ईश्वर मंत्र को सांस के साथ जपने से ब्रह्मप्रकाश मस्तक में उभरने लगता है, वेद द्वारा ईश्वरस्तुति करने से एक दिव्य आनन्द अनुभूति साधक को प्राप्त होने लगती है, जो देवताओं का ईश्वर है वो ही सबका है, वह प्रभु सर्वव्यापी है, वह महासागरों से घिरे सप्तलोकों से परे है, कोई भी उस सत्ता के सत्य को नहीं जानता । सब जगह वो एक ईश्वर ही विद्यमान है, अपनी सांस के स्पन्दन को नाभी से उठाकर मस्तक और ब्रह्मरन्ध्र में उसके स्पन्दन को महसूस करना चाहिये वह ईश्वर तो चारों दिशाओं में फैला हुआ है किस दिशा में किस देश में किस काल और युग में वह नहीं ? तुम उसकी पवित्र छाया का आश्रय लो तब तुम इस कोलाहल भरे कर्मसागर को पार करोगे और उस परम के किनारे पर पहुँचोगे । परमेश्वर के चरणों की अनुकम्पा को प्राप्त करने के बाद ज्ञान के स्वर्णिम संसार में दिव्य की अनंत गतिविधियों को देखते हुए मैने 7 करोड़ युगों तक अद्वितीय जीवन प्राप्त किया है जहाँ ना दिन होता है ना रात्री, वहाँ चकाचौंध करने वाला एक प्रकाश फैला रहता है, मृत्यु इस स्थान पर शान्त हो जाती है, जब मेरे हृदय में श्रद्धा और विनय का उदय हुआ तो ईश्वर ने स्वयं आकर मेरा हाथ पकड़ लिया । प्रकृति के साथ रहने में पशु वृत्ति रहती है और ईश्वर के साथ रहने से आत्मा दिव्य हो जाती है । मुझे ज्ञान देने वाले परमेश्वर ने मेरे भीतर प्रवेश किया और मेरे भौतिक शरीर को चेतनामय करके सदा के लिये मेरे भीतर बस गया शरीर तत्व मन काल और माया के मूल से जुड़े बिना अनंत दिव्य स्वर्ग अनादि ज्ञान सत्ता से यदि कोई एकाकार कर लेता है तो वह अति दिव्य रूपान्तरित शरीर यानि वीयकाया को प्राप्त कर लेता है, यह ईश्वर के साथ एकाकारता की अनुभूति करने से होता है, भौतिक शरीर भी वैसा ही महत्वपूर्ण है जितनी आत्मा, शरीर के बिना आत्मा शून्य जैसी है, अतः भौतिक शरीर की कभी निन्दा नहीं करनी चाहिये ।
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| may 2020 mukit ka rasta |


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