वह परमात्मा चराचर भूत प्राणियों में
आकाश की तरहा समाया है।
आकाश की तरहा समाया है।
क्या अमृत क्या मृत्यु उसकी ही छाया है||
फुलसन्दे वाले बाबा कहें प्रभ सब कुछ तेरी माया है।
तेरा ध्यान हे परमब्रह्म !
सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वालों के चरणों में जब उनके देवात्मा
शिष्य नमन वन्दन पूजन करके शान्ति पूर्वक बैठ गये तब उन ज्ञान वार्ता को सुनने के
इच्छुक सतपुरूष ने उनके सम्मुख ये ईश्वरीय बचन कहने प्रारम्भ किये –
हे देवआत्माओं ! हे देवपुत्रों ! सुनो ऋषिः विश्वामित्रः।।
देवता-सविता।। छन्द:- गायत्री।।
“तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य
धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्||ऋ 3 1 62 ।
सवितुः- प्रेरक, उत्पादक देवस्य-परमात्मदेव
के तत्-उस वरेण्यम्-वरन योग्य भर्ग:-पापों को भून देने वाला तीव्र
ईश्वरीय तेजस धीमहि-हम धारण करते हैं।


मुझे क्या करना चाहिये क्या
नहीं यह मैं नही जानता। किस समय क्या कर्तव्य है क्या अकर्तव्य, क्या धर्म है क्या अधर्म यह मैं
नहीं जान पाता। सुना है कि बड़े बड़े ज्ञानी भी बहुत बार इस तरह किंकर्तव्यविमूढ़
हो जाते हैं, परन्तु
क्या इसका कोई इलाज नहीं है ? हे परमब्रह्म ! क्या तूने हमें उत्पन्न करके इस अंधेरे संसार
में यूंही छोड़ दिया है ? कोई
निर्धान्त निश्चित प्रकाश हमारे लिए तुमने नहीं दिया है यह कैसे हो सकता है ? नहीं, तुम अपने अनन्त प्रकाश के साथ
सदा हमारे हो। यदि हम चाहे और यत्न करें तो तुम हमें अपने प्रकाश से आप्लावित कर
सकते हो। इसके लिए हम आज से ही यत्न करेंगे और तेरे उस भर्ग विशुद्ध तेज को अपने
में धारण करने लगेंगे जो वरणीय हैं, जिसे हर किसी को लेना
चाहिये-जिसे प्रत्येक मनुष्य जन्म पाने वाले को अपने अन्दर स्वीकार करने की
आवश्यकता है। इस तेरे वरणीय शुद्ध स्वरूप का हम जितना श्रवण, मनन, निदिध्यासन करेंगे अर्थात्
जितना तेरा कीर्तन सुनेंगे, तेरा
विचार करेंगे तुझमें मन एकाग्र करेंगे, तेरा जप करेंगे, तुझमे अपना प्रेम समर्पित
करेंगे, उतना ही
तेरा शुद्ध स्वरूप हमारे अन्दर धारण होता जाएगा। बस, यह ऊपर से आता हुआ तुम्हारा तेज
ही हमारी बुद्धि को और फिर हमारे कर्मो को ठीक दिशा में प्रेरित करता रहेगा। इस
शुद्ध स्वरूप के साथ तुम ही मेरे हृदय में बस जाआगे और तुम ही मेरी बुद्धि, मन आदि सहित इस शरीर के सन्चालक
हो जाओगे । फिर धर्म-अधर्म की उलझन कहाँ रहेगी तुम्हारे पवित्र संस्पर्श से इस
शरीर की एक एक चेष्टा में शुद्ध धर्म की ही वर्षा होगी। इसलिए हे प्रभो ! हम आज से
सदा तुम्हारे शुद्ध तेज का अपने में धारण करने में लगते हैं। एक –एक मानसिक विचार के साथ, एक एक जप के साथ इस तेज का अपने
अन्दर आहवान करेंगे और इस तरह प्रतिदिन इस तेज को अपने में अधिकाधिक एकत्र करते
जाएँगे। निश्चय है कि इस दिव्यता की प्राप्ति के साथ साथ धर्म के निश्चय में पटु
होती हुई हमारी बुद्धि एक दिन तुम्हारी सर्वज्ञता के कारण पूर्ण रूप से ठीक मार्ग
पर चलने वाली हो जाएगी।

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