हे प्रभु मुझे बचा -
तू चाहे तो तिनके को तरादे।
तू चाहे तो जहाजों को डुबा दे।
तू चाहे तो मूरख को विद्याधर बानदे।
तू चाहे तो गूंगे को गन्धर्व बनादे।
फुलसन्दे वाले बाबा कहते तू
मुझे अपना साज बनादे।
एक आसमानी गीत इस पर बजादे।
हे प्रभु मुझे बचा
परमब्रह्म के ध्यान में स्थित हुए सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं
जीवानो अभि धेतनादित्यास: पुरा हथात्।
कद्ध स्थ हवनश्रुतः||
ऋ-7| 67 | 5 ऋषि:-
मत्स्यः साम्मदः,
एक आसमानी गीत इस पर बजादे।
हे प्रभु मुझे बचा
परमब्रह्म के ध्यान में स्थित हुए सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं
जीवानो अभि धेतनादित्यास: पुरा हथात्।
कद्ध स्थ हवनश्रुतः||
ऋ-7| 67 | 5 ऋषि:-
मत्स्यः साम्मदः,
मैत्रावरूणिर्बहवो वा मत्स्या जालनद्धाः||
देवता-आदित्य:। छन्द:- निवृद्गायत्री||
हे आदित्य पुरूष परमेश्वर हे देव ! मुझे बचाओ ! मृत्यु मेरे सामने मुंह खोले खड़ी है। अगले ही क्षण में मैं उसका ग्रास होने वाला हूँ | भोगों को भोगते हुए तो हमें मालूम न था कि ये आसानी से भोगे जाते हुए भोग एक दिन भोक्ता बनकर हमें खाने के लिए आएंगे। उस समय हम खुशी से अपने को इन विषयों के बन्धन-जाल में बांधते गये, यह अनुभव न किया कि हम मृत्यु के जाल में बंध रहे हैं। परन्तु अब इस समय का यह मृत्यु मुख में जाने का एक क्षण, पश्चातापमय यह एक क्षण, शेष सारे बीते हुए जीवनकाल के मुकाबले में खड़ा है। बस यही एक क्षण है इस बीच, हे ज्योर्त ब्रह्म !
सनातन पुरूष मैं तुम्हें पुकार रहा हूँ | सुना है तुम अखण्डनीय शक्ति हो, तुम बन्धन जाल से छुड़ाने वाली शक्ति हो, तुम प्रकाश देने वाली शक्ति हो । तुम कहाँ हो ? मेरी पुकार क्यों नहीं सुनते ? क्षण भर में दम निकलना चाहता है। तुम तो पुकार सुनने वाले हवनश्रुत प्रसिद्ध हो। तुमने बड़े बड़े पापियों के हार्दिक पश्चाताप के कारण कन्दनों को सुना है और उन्हें अन्तिम समय में भी उबारा है। क्या यह मेरा इस समय का पश्चातापमय रूदन भी हृदय से निकला रूदन नहीं है ? तो फिर तुम क्यों सुनते ? क्यों नहीं दौड़कर मुझे बचाते ? क्या अगले क्षण जब मैं मर चुकंगा, मेरा विनाश पूर्ण हो चुका होगा, मेरी समाप्ति हो चुकी होगी, तब आओगे? तब क्या बनेगा ? ओह ! यदि मेरा उबारना अभीष्ट है तो ये जो जीवन के दो चार पल शेष हैं, इन्हीं में आ पहुंचो । दौड़ो, मुझे बचाओ, मुझे बचाओ ! शरीर नश्वर और आत्मा अजर अमर है तुम तीनो लोकों में प्रवेश करके सृष्टि के एक एक कण में भासित हो रहे हो ये तो मैं ही हूँ जो अपनी आत्मा में समाये तुम्हारे प्रकाश को देख ना सका संसार की प्रीत में पड़ा तुम्हारी सच्ची प्रीत को मैं पा न सका ।
शब्दार्थ- आदित्यास: हे आदित्य पुरूष ब्रह्म ! अभिधेतन दौड़ौ जीवान् नः हम जीते रहतों के पास हथात् पुरः हमारे मारे जाने से पहले ही दौड़ौ। हवनश्रुत: हे पुकार सुनने वाले ! कद्ध स्थ- तुम कहां हो?
देवता-आदित्य:। छन्द:- निवृद्गायत्री||
हे आदित्य पुरूष परमेश्वर हे देव ! मुझे बचाओ ! मृत्यु मेरे सामने मुंह खोले खड़ी है। अगले ही क्षण में मैं उसका ग्रास होने वाला हूँ | भोगों को भोगते हुए तो हमें मालूम न था कि ये आसानी से भोगे जाते हुए भोग एक दिन भोक्ता बनकर हमें खाने के लिए आएंगे। उस समय हम खुशी से अपने को इन विषयों के बन्धन-जाल में बांधते गये, यह अनुभव न किया कि हम मृत्यु के जाल में बंध रहे हैं। परन्तु अब इस समय का यह मृत्यु मुख में जाने का एक क्षण, पश्चातापमय यह एक क्षण, शेष सारे बीते हुए जीवनकाल के मुकाबले में खड़ा है। बस यही एक क्षण है इस बीच, हे ज्योर्त ब्रह्म !
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| satpurush baba fulsande bale |
सनातन पुरूष मैं तुम्हें पुकार रहा हूँ | सुना है तुम अखण्डनीय शक्ति हो, तुम बन्धन जाल से छुड़ाने वाली शक्ति हो, तुम प्रकाश देने वाली शक्ति हो । तुम कहाँ हो ? मेरी पुकार क्यों नहीं सुनते ? क्षण भर में दम निकलना चाहता है। तुम तो पुकार सुनने वाले हवनश्रुत प्रसिद्ध हो। तुमने बड़े बड़े पापियों के हार्दिक पश्चाताप के कारण कन्दनों को सुना है और उन्हें अन्तिम समय में भी उबारा है। क्या यह मेरा इस समय का पश्चातापमय रूदन भी हृदय से निकला रूदन नहीं है ? तो फिर तुम क्यों सुनते ? क्यों नहीं दौड़कर मुझे बचाते ? क्या अगले क्षण जब मैं मर चुकंगा, मेरा विनाश पूर्ण हो चुका होगा, मेरी समाप्ति हो चुकी होगी, तब आओगे? तब क्या बनेगा ? ओह ! यदि मेरा उबारना अभीष्ट है तो ये जो जीवन के दो चार पल शेष हैं, इन्हीं में आ पहुंचो । दौड़ो, मुझे बचाओ, मुझे बचाओ ! शरीर नश्वर और आत्मा अजर अमर है तुम तीनो लोकों में प्रवेश करके सृष्टि के एक एक कण में भासित हो रहे हो ये तो मैं ही हूँ जो अपनी आत्मा में समाये तुम्हारे प्रकाश को देख ना सका संसार की प्रीत में पड़ा तुम्हारी सच्ची प्रीत को मैं पा न सका ।
शब्दार्थ- आदित्यास: हे आदित्य पुरूष ब्रह्म ! अभिधेतन दौड़ौ जीवान् नः हम जीते रहतों के पास हथात् पुरः हमारे मारे जाने से पहले ही दौड़ौ। हवनश्रुत: हे पुकार सुनने वाले ! कद्ध स्थ- तुम कहां हो?


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