सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले
सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

आलसी मत बनो-पुष्पक नाम का हाथी -nandi ji ke janm

आलसी मत बनो-

-nandi ji ke janm

पुष्पक नाम का हाथी


बिन स्याही बिन शब्दों के मैने एककिताब लिखी।
दिल के पन्नो पर प्रभतेरे प्यार की हर बात लिखी॥
पहाड़ों में गिरती बरफ के समान पन्ने मेरी किताब के।
साफ सुथरे हृदय जैसे बोल इस किताब के॥
फुलसन्दे वाले बाबा कहें इसे प्रभ प्रीतम पढ़ता है।
उसकीयाद में दिल पंछी की तरहा तड़पता है।


नहला के झूम के सारे बदन सो जायेगे |
खाक है हम ख़ाक में ही मुन्तदिल हो जायेंगे |
आप की खुबुशु की तलब में गर यूँ ही चलते रहे |
देख लेना एक दिन हम रौशनी हो जायेंगे |
इस तरह आपसे मिलेंगे जैसे पानी में नमक |
फिर हम कहा हम रहेंगे हम तो आप ही हो जायेंगे ||


**************************************


सुनता आया हूँ तू मिलता है बड़ी मुस्किल से
तू और भी मुश्किल हो जा
मैं एक दिन तुझे पा के रहूँगा ||
है तकाजा ये मुहब्बत सबके सर से /
जहाँ अक्ल तक ना पहुचे मैं गुजर गया वहाँ से 

सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं-एक सुभा शिव ध्यानशिला पर बैठे प्रवचन कर रहे थे उन्होने कहा- गणों ! आलसी मत बनो धर्मध्यान में रत रहो अपने चित्त की रक्षा करो कीचड़ में फंसे हाथी की तरहा इस कठिन संसार से अपना उद्धार करो। एक राजा के पास पुष्पक नाम का एक महाबलवान् हाथी था। उसने अपने महाराज को कई भयंकर युद्धों में विजय दिलाई थी वह वास्तव में राज्य का गौरव था । वृद्ध होने पर राजा ने उसे स्वच्छन्द छोड़ दिया। वह जहां चाहता घूमता फिरता और आराम करता। एक दिन वह तालाब की दलदल में फंस गया बहुत प्रयत्न करने पर भी जब नहीं निकला तब लोगों ने राजा के पास जाकर कहा- महाराज ! यह हाथी कितने काम आया पर आज यह संकट में फंस गया है कृपया किसी भी तरह इसके प्राणों की रक्षा कीजिये । तब राजा ने जनता की भावना का आदर करते हुए महावत को भेजा। महावत जानता था यह तो योद्धा हाथी है युद्ध कौशल को खूब पहचानता है अतः उसने दलदल के निकट जाकर किनारे पर रणभेरी बजवाई रणभेरी को सुन हाथी में जोश भर गया और पूरे वेग के साथ उठ कर किनारे पर आ गया। शिव ने कहा ऐसे ही गणों ! किसी भी तरह प्रयत्न करके तुम लोग भी अपना उद्धार कर लो। अपने मन को सावधान रखो। यदि तुम रूपादि आलंबनों के चक्कर में फंस गए तो तुम मोक्ष तक नहीं पहुंच पाओगे। चक्षु का आलंबन रूप है, सुंदर सुंदर रूप चित्त को भटका देते हैं। कानो का आलंबन शब्द है मधु मधुर शब्द चित्त को विचलित करते हैं, घ्राण का अलंबन है गंध, यह प्रिय अप्रिय गंध चित्त को अटका देती है जीभ का स्वाद आलंबन है। यह चित्त को एकाग्र नहीं रहने देता । मन का आलंबन है धर्म विभिन्न प्रकार के धार्मिक संवेग चित्त की एकाग्रता को भंग करते हैं अतः ध्यान के अभ्यास में लगे रहो इस प्रकार प्रमाद को त्याग कर अपने चित्त की साधना करने पर ही परमशान्त अवस्था की प्राप्ती कर सकोगे। नन्दी ! चक्षु, श्रोत, जिभ्या, काया, तथा मन सभी अनित्य हैं दुखमय हैं। इस गंदले पानी से भरे गड्ढे को देखो और उसमें अपना चेहरा देखो तुम्हें चेहरा नहीं दिखाई देगा धुंधला दिखाई देगा उसी प्रकार जब तक किसी के चित्त में गंदगी फैली हुई है उसे आतम दर्पण में अपनी प्रकाशित सुनहरी आत्मा नहीं दीख सकती इस गंदगी को साधना आराधना द्वारा साफ करो ।

Post a Comment

0 Comments