nandi ji ke purv janm
||गृहवास गर्म राख है||
धर्मशास्त्रशब्द मात्र हैं जब तक आचरण ना करे।
किताबों के ढेर के ढेर भला किसको पार करें।।
जब पवित्र विचार पवित्र कर्म हमारे बन जाते।
तब जीवन वृक्ष पर फूल ही फूल खिल जाते॥
फुलसन्दे वाले बाबा कहते करो सत कर्म विचार।
तभी हो सकता है तुम्हारे संसार में उजियार।
सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं-ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर फैली पहाड़ियों में कुछ गुफाऐं थीं जहाँ महादेव शिव अपने शिष्यगणों के संग निवास करते थे उन शिष्यों की सारी देखभाल शिव के प्रमुख गण नन्दी किया करते थे। एक सुभा नन्दी झामर नाम के साधु से बैठे हुए बातें कर रहे थे कि यह चित्त जिधर चाहे उधर स्वच्छन्द जाता रहता है उसे अच्छी तरह वैसे ही अपने वश में लाना चाहिए जैसे कि अंकुश से महावत भड़के हुए हाथी को वश में रखता है। एक शील सम्पन्न उपासिका ने अपने पुत्र झामर को बहुत श्रद्धा से शिव के चरणों में लाके प्रव्रजित कराया था। उसके पूर्व जन्म की मां यक्षिणी होकर उत्पन्न हुई थी, वह यक्षिणियों में बहुत सम्मनित हो गई थी। झामर शिव का आश्रम छोड़ कर जवान होने पर कामवासना के वशीभूत हो गृहस्थ हो जाने के लिए घर चला गया था। उसी समय उसकी पिछले जनम की माता यक्षिणी उसके उस विचार को जान कर उसके शरीर में प्रवेश कर गई। जब गांव भर के लोग जुटे तब उसने कहायह यदि धर्म करेगा तो ठीक है, नहीं तो कहीं जाकर भी नहीं बच सकता मैं इसे यमलोक पहुँचा दूंगी। थोड़ी देर में झामर को होश आया और अपनी उस दशा को देख बहुत दुखी हुआ। उसने लेटे लेटे ही अपनी माता से पूछा- मां ! लोग तो किसी के मर जाने पर रोया करते हैं तु किस लिये रो रही है? उसकी माता ने कहा- पुत्र जो व्यक्ति साधू होने के बाद फिर गृहस्थ बनता है लोग उसके लिये रोया करते हैं क्योंकि वह जीवित होते हुए भी मरा हुआ है समाज ऐसे को सम्मानजनक नहीं मानता। पुत्र ! गृहवास गर्म राख है तथा नरक में गिरने के समान है तुम गर्म राख के ढेर के सामने खड़े हो तुम उसमें गिर जाना चाहते हो यह गृहस्थ आश्रम तो नरक के द्वार के समान दुखदायी है तुम्हें ये सोचकर मैने प्रव्रज्या दिलवाई थी कि कहीं तुम गृहस्थ धर्म के पापों में न जल जाओ यदि तुम वहीं आकर जलना चाहते हो तो तुम्हारी इच्छा शिव कहते हैं दौड़ो अपने को बचाओ तुम तो जलते हुए भवन में फेंके गए सामान पुनः स्वयं आकर जलना चाहते हो। माता द्वारा इस प्रकार समझाये जाने पर गृहस्थ होने के विचार को छोड़कर झामर फिर शिव की शरण में चला गया था | नन्दी ने कहा झामर चलो महादेव हमारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे साधुओं के लिए गुड़ का पानी भी अभी पकाना है । वे दोनो चल पड़े ।
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| ek tu sachcha tera naam sachcha |
सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं-ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर फैली पहाड़ियों में कुछ गुफाऐं थीं जहाँ महादेव शिव अपने शिष्यगणों के संग निवास करते थे उन शिष्यों की सारी देखभाल शिव के प्रमुख गण नन्दी किया करते थे। एक सुभा नन्दी झामर नाम के साधु से बैठे हुए बातें कर रहे थे कि यह चित्त जिधर चाहे उधर स्वच्छन्द जाता रहता है उसे अच्छी तरह वैसे ही अपने वश में लाना चाहिए जैसे कि अंकुश से महावत भड़के हुए हाथी को वश में रखता है। एक शील सम्पन्न उपासिका ने अपने पुत्र झामर को बहुत श्रद्धा से शिव के चरणों में लाके प्रव्रजित कराया था। उसके पूर्व जन्म की मां यक्षिणी होकर उत्पन्न हुई थी, वह यक्षिणियों में बहुत सम्मनित हो गई थी। झामर शिव का आश्रम छोड़ कर जवान होने पर कामवासना के वशीभूत हो गृहस्थ हो जाने के लिए घर चला गया था। उसी समय उसकी पिछले जनम की माता यक्षिणी उसके उस विचार को जान कर उसके शरीर में प्रवेश कर गई। जब गांव भर के लोग जुटे तब उसने कहायह यदि धर्म करेगा तो ठीक है, नहीं तो कहीं जाकर भी नहीं बच सकता मैं इसे यमलोक पहुँचा दूंगी। थोड़ी देर में झामर को होश आया और अपनी उस दशा को देख बहुत दुखी हुआ। उसने लेटे लेटे ही अपनी माता से पूछा- मां ! लोग तो किसी के मर जाने पर रोया करते हैं तु किस लिये रो रही है? उसकी माता ने कहा- पुत्र जो व्यक्ति साधू होने के बाद फिर गृहस्थ बनता है लोग उसके लिये रोया करते हैं क्योंकि वह जीवित होते हुए भी मरा हुआ है समाज ऐसे को सम्मानजनक नहीं मानता। पुत्र ! गृहवास गर्म राख है तथा नरक में गिरने के समान है तुम गर्म राख के ढेर के सामने खड़े हो तुम उसमें गिर जाना चाहते हो यह गृहस्थ आश्रम तो नरक के द्वार के समान दुखदायी है तुम्हें ये सोचकर मैने प्रव्रज्या दिलवाई थी कि कहीं तुम गृहस्थ धर्म के पापों में न जल जाओ यदि तुम वहीं आकर जलना चाहते हो तो तुम्हारी इच्छा शिव कहते हैं दौड़ो अपने को बचाओ तुम तो जलते हुए भवन में फेंके गए सामान पुनः स्वयं आकर जलना चाहते हो। माता द्वारा इस प्रकार समझाये जाने पर गृहस्थ होने के विचार को छोड़कर झामर फिर शिव की शरण में चला गया था | नन्दी ने कहा झामर चलो महादेव हमारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे साधुओं के लिए गुड़ का पानी भी अभी पकाना है । वे दोनो चल पड़े ।


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