NANDI-
अनगार की कहानी
पक्षी है आत्मा शरीर जंजीर के समान ।
पिंजरे में पड़ा फड़फड़ाता पंछी बीमार के समान ।।
कैसे उड़े आकाश में पड़ी पैर में जंजीर।
सागर पार बसे है वो कौन बतावे मेरी पीर॥
फुलसन्दे वाले बाबा कहते कैसे उसे जाके चूमूं।
पागल सा बना उसके लिए मैं धरती पर घूमूं।
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| satpurush baba fulsande vale |
अनगार
सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं-अनगार नाम का एक गरीब किन्तु बहुत ही उच्च कला को जानने वाला जुलाहा था वह कपड़ा बुनता बाजार में बेचता और अपने परिवार का पालन करता। एक बार उसने बहुत ही शानदार बारीक किन्तु बड़ा ही कीमती कपड़ा बुना उसे लेके वो बाजार गया कपड़ा बहुत बड़ा और आलीशान था बहुत मंहगा भी था ये देख किसी की हिम्मत उसे लेने की नहीं हुई शाम हो गई वह निराश वापस घर को आने लगा। रास्ते में देखा एक कमजोर भिखारी जैसा वृद्ध शीत से काँप रहा था। उसने उस अनगार जुलाहे को आवाज दी कहा मैं ठण्ड से परेशान हूँ क्या ये कपड़ा तुम मुझे दे सकते हो? मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है। अनगार ने प्रसन्नता पूर्वक वो कपड़ा उस वृद्ध को दे दिया। उसके सामने ही उस वृद्ध ने उस कपड़े के कई टुकड़े कर डाले। एक को सिर से बाँध लिया दूसरे को हाथों में लपेट लिया तीसरे को पैर में तथा चौथे टुकड़े को अपनी कमर से लपेट लिय। वह बूढ़ा कपड़े को फाड़ता हुआ अनगार से बोला कोई परेशानी तो तुमको नहीं हो रही है ना? अनगार ने कहा अब यह कपड़ा तुम्हारा है बाबा चाहे इसके कितने ही टुकड़े करो मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है। अनगार ने कहा मुझे लगता है बाबा आप भूखे भी हो? वृद्ध ने कहा हाँ बेटा बहुत भूख लगी है पर गरीबों की तरफ कोई ध्यान ही कब देता है? अनगार ने कहा मेरे साथ मेरे घर चलो वह उसे अपने यहाँ ले आया अपनी पत्नी से कहा घर में खाने में क्या बनाया है एक मेहमान भी आज हमारे साथ आये हैं। पत्नी ने पति के पास जाकर उसको एक तरफ लेजाकर कहा आज इतना भोजन नहीं है कि उसे दो आदमी खा सकें केवल तुम्हारे ही लिए थोड़ा सा खाना है। अनगार ने कहा खाना थाली में लगादो मेहमान का सत्कार करना आवश्यक है, दाल चावल उस स्त्री ने एक थाली में परोस कर दे दिये। उस वृद्ध ने एक बर्तन मंगाया और एक मुट्ठी चावल उस बर्तन में डाले वो अक्षयपात्र बन गया वह वृद्ध शिव थे वे प्रकट हो गये उन्होने अनगार को हृदय से लगा लिया। उस पात्र का भोजन कभी समाप्त नहीं हुआ अनगार रात दिन लोगों को उस पात्र से भोजन कराता रहा। ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर ये बात शिव नन्दी को सुना रहे थे बोले मालूम है नन्दी उस जनम में तुम ही अनगार नाम के दयालु जुलाहे थे और वो वृद्ध तो मैं ही था। नन्दी ने शिव के चरणो पर मस्तक रख दिया ।
NANDI MAHARAJ KE PURV JANM


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