सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले
सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

तू मेरा दिल है मेरी जान मेरे सतगुरु TU MERA DIL

” जब चारों और अँधेरा हो ,


” गुरु ” का दीप जला लेना !


” जब गमों ने तुमको घेरा हो ,


तुम हाल “गुरु ” को सुना देना !


” जब दुनिया तुमसे मुँह मोड़े ,


तुम अपने “गुरु ” को मना लेना !


” जब अपने तुमको ठुकरा दें ,


”गुरु” दर को तुम अपना लेना !


” जब कोई तुमको रुलाये तो ,


तुम “गुरु ” के गीत गुनगुना लेना !


” गुरु” करुणा का सागर है ,


तुम उसमें डुबकी लगा लेना…!!!





पागल तेरे दर का, कहलाना अच्छा लगता है।

घूम ली सारी दुनिया पर, देख लिया सबको ,

बस एक तू ही सच्चा लगता है।

ऊपर नीचे मैं क्या खोजूं, और कहां जाऊ 

में जी हर और तेरा ठिकाना लगता है। 

चारों और तेरा ही नाम है 

जिसे देखो सतगुरु वो तेरा ही दीवाना लगता है..।

जिनको बख्शी है नजर तुमने,
वो तुम्हारी ही बातें करते हैं।
जिस दिल पे है गर्दा दुनियाँ का
वो मारे-मारे फिरते हैं।।
तेरी उल्फत का नशा पीकर
के जो हो गये तेरे
दीवाने दरों दीवारों से भी वो
तेरे ही हुस्न का चर्चा करते हैं।
शैतान ने जिनके सीने पे,
पहरा अपना बैठाया है।
वो परमेश्वर के रस्तों पे भी
काँटे बिखराया करते हैं।।
फुलसन्दे वाले बाबा मुझे
न छोड़यो अकेला तुम
अम्बर से मेरे आँगन
में तेरे देवता आया करते हैं।
EK TU SACHCHA TERA NAAM SACHCHA
EK TU SACHCHA TERA NAAM SACHCHA 
राग भैरवी

तू मेरा दिल है मेरी जान मेरे सतगुरु।

दो जहाँ आप पे कुर्बान मेरे सतगुरु।।
किसकी मुश्किल में तेरी जात ना आड़े आई।
किसपे नहीं आपका अहसान मेरे सतगुरु।।
तेरा दीदार है दीदारे इलाही मुझको।
तेरी उलफत मेरा ईमान मेरे सतगुरु ।।
मजमाए हश में इस शान से मैं आऊँ।
सिर पे हो आपका दामन मेरे सतगुरु।।
मुझको फुलसन्दे में तेरी रोशनी के साये हैं।
तेरी रहमत का है मेरे सिर पे आसमान मेरे सतगुरु।।




साई तेरी नज़र पड़े,
तो लाखों करें सलाम,
और जो तेरी नज़र फिरै,
तो गल-गल के गिरै चाम।।




प्यासा ही रहने दे मुझे मत दे ये सागर।
कभी बुझा पाया कहाँप्यास किसी की सागर॥
देना है तो प्रभ अपने प्यार की एक बूंद देदे।
अपने नूर की मुझे एक बूंद देदे॥


फुलसन्दे वाले बाबा कहते आत्मा
तुझ बिन प्यासी
प्यास मिटे जब तू मिले
परमपुरख अविनासी॥


स्वर्ण वर्ण मछली
सतपूरूष बाबा फलसन्दे वाले कहते हैं-ब्रह्मपुत्र नदी में केवट्ट गांव के मल्लाहों के लड़कों ने जाल फेंक कर सुवर्ण रंग की एक मछली को पकड़ा। उसके शरीर का रंग सुवर्ण जैसा था किंतु उसके मुख से दुर्गन्ध निकलती थी। मल्लाहों ने इनाम पाने की गरज से उसे राजा रतनसार को दिखाया राजा रतनसार उसे एक पात्र में रखकर शिव के पास ले गया। राजा ने मछली का मुंह खोला जिससे सारा तपोवन दुर्गन्ध से भर गया, राजा ने शिव को प्रणाम कर पूछा- प्रभु क्यों इसका शरीर सुवर्ण जैसा है और इसके मुख से दुर्गध क्यों आती है? शिव बोले राजा! यह मतस्य नारद मुनि के शासन में कम्बल नामक एक अभिमानी और दुराचारी वेद का ज्ञाता ऋषि था। इसने किसी की बात नहीं मानकर नारद मुनि के शासन को गिराया था। इसने बहुत दिनों तक वेद वचनो का पाठ किया और धर्म की प्रशंसा की उसके फल से सुवर्ण वर्ण प्राप्त हुआ और जो इसने ऋषियों को भला बुरा कहा उसके फल से इसके मुख से दुर्गन्ध आती है। क्या मैं अपनी बात का उसी के मुंह से समर्थन करवा दूं? राजा ने हामी भर दी। शिव ने पूछा- क्या तू कम्बल है ? कहां से आये हो? तुम्हारा बड़ा भाई स्वात अब कहां है ? मत्स्य ने उत्तर दिया हां मैं ही कम्बल हूँ | अवीचि नरक से आया हूँ | मेरा भाई तो मोक्ष गति को प्राप्त हो गया। शिव ने पूछा- तुम्हारी साधवी नामक माता कहां है ? अब तू कहाँ जायेगा? मत्स्य ने उत्तर दिया- भंते ! निम्न योनि में उत्पन्न हुई है मेरी माता और अब मैं उसके साथ अवीचि नरक में जाऊँगा। यह कहकर वह उदास हो पात्र में सिर पटककर मर गया और उसी समय अवीचि नरक में जाकर उत्पन्न हुआ। सुनने वाले लोग सन्न रह गये उन्हें रोमांच हो आया। तब शिव ने लोगों सहित नंदी से कहा- जो व्यक्ति प्रमादी होते हैं वे न तो आतम ध्यान भावना में वृद्धि कर पाते हैं न व्रत उपवास विपशना जप में लाभांवित हो पाते हैं जैसे कोई मालवा लता किसी वृक्ष को सब तरफ से घेर कर उसे बांधती हुई उसी को नष्ट कर देती है उसी प्रकार यह तृष्णा भी पुरूष के चक्षु रसना आदि छ: द्वारों के आलंबन से पुनः पुनः उत्पन्न होती हुई बढ़ती ही रहती है। इस तृष्णा के वश में हुआ मनुष्य संसार में डूबता उतरता रहता है वानर की तरहा इधर उधर दौड़ता रहता है ।

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