गुरुदेव दया करना
मेरी और नज़र रखना
गंगा में रहते हो
जमुना में रहते हो
सरयू में बैठ कर के
मेरी ओर नज़र रखना
चंदा में रहते हो
सूरज में रहते हो
तारो में बेठ कर के
मेरी ओर नज़र रखना
गुरुदेव दया करना
मेरी ओर नज़र रखना
ब्रह्मः में रहते हो
विष्णु में रहते हो
भोले में बेठ के
गीता में रहते हो
भगवत में रहते हो
रामायण में बेठ कर के
मेरी और नज़र रखना
सतयुग में रहते हो
द्वापर में रहते हो
कलयुग में बेठ कर के
मेरी और नज़र रखना
मंदिर में रहते हो
मस्जिद में रहते
हो सत्संग में बेठ कर के
मेरी ओर नज़र रखना
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सहयोग कर्ता -बहन देवपुत्री भोरशिखा भटनागर
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अपने कानो में ढूंस ले रुई मत दुनियां की बात सुन।
तभी अविनासी सजन की बात तू पाएगा सुन॥
जो दुनियां की सुनते रहे वे नहीं पहुँचे उस तरफ।
गफलत में पड़े रह गये नहीं पाए प्रभ परमपुरख॥
फुलसन्दे वाले बाबा कहते मत दुनियां की सुन ।
उस सच्चे सुल्तान की बातें तभी पाएगा तू सुन॥
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तृष्णा की जड़
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तृष्णा की जड़
सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं-ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर एक प्रातः शिव अपने मुख्य शिष्य नंदी के संग विचरण कर रहे थे शिव ने कहा नंदी देखो जैसे दृढमूल के बिल्कुल नष्ट न होने से कटा हुआ वृक्ष भी फिर से बढ़ जाता है, वैसे ही तृष्णा के नष्ट न होने से यह दुख चक बार बार उत्पन्न होता रहता है। वहाँ निकट ही एक बकरी को देख कर शिव हंसे कहा नंदी ये बकरी ककुबुष्णिक ऋषि के धर्म शासन में उनके आश्रम में एक कबूतर होकर उत्पन्न हुई थी वह उन योगी के स्वाध्याय करने के शब्दों को सुनकर वहां कुछ ज्ञानवंत हुई तथा अगले जनम में वह अशोकवती नाम की राजकन्या होकर उत्पन्न हई। उसे प्रथम ध्यान आत्मा में प्राप्त था। उस जीवन के बाद वह ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुई । वहाँ उसे पुनः देवों के संग से तृष्णा उत्पन्न हुई पुण्य क्षीण होने पर वह पुनः पृथ्वी पर मानवी बनी उससे भी निम्न स्थिति में इस समय यह जनम मरण में चक्कर काटती हुई बकरी बनी है। उसे सुनकर नंदी को महान बैराग संवेग उत्पन्न हुआ तब शिव ने कहा नंदी इस तृष्णा के दोषों को देखो यह तृष्णा तीन प्रकार की है 1- काम तृष्णा- काम भोगों की प्राप्ती के लिये जो तृष्णा हो जाती है, काया के नौ द्वारों अर्थात् आंख रूप को, जीभ के रस को कान के द्वारा शब्दों के आनंद लेने की प्रबल इच्छा, नाक गंध को लेने की प्रबल इच्छा और त्वचा द्वारा स्पर्श का आनंद लेने की प्रबल इच्छा ही काम तृष्णा कहलाती है 2- भव तृष्णा- जो लोग इस जन्म में अतिशय दुखी हैं और यह सोचते हैं कि मैं भावी जन्म में पैसे वाला बनूं अच्छा व्यक्ति बनूं इस प्रकार जन्म लेने की प्रबल इच्छा और अधिक समय तक जीवित रहने की कामना भवतृष्णा कहलाती है। 3-विभवतृष्णा- जीवन में अधिक धन अधिक ऐश्वर्य अधिक से अधिक भोग सुख प्राप्त करने की कामना विभव तृष्णा कहलाती है, विभव तृष्णा उन्हीं को होती है जो समझते हैं कि इस जीवन से पहले उनको कोई जीवन न था और न शरीर के ध्वंस हो जाने के बाद कोई नया जीवन होगा ऐसा व्यक्ति या तो निराशा का जीवन व्यतीत करता है अथवा धन एवं ऐश्वर्य मिल जाने पर सदाचार को तिलांजलि देकर निपट निरंकुश और मनमाना स्वतंत्र जीवन व्यतीत करता है, विभव दुख ही नहीं अशान्ति का भी मूल है, इसमें अनर्थ, चोरी, डाका हत्या, लूट, युद्ध,रक्तपात और विनाश छिपा हुआ रहता है तृष्णा की जड़ खोद डालो।


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