सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले
सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

सर्वोच्च साधना- guru ka gyan

सत्य के जो विचरीत चले वो है मरे समान।

बात गुरू की काटे सदा वो है प्रेत समान ||

अंहकार सिर पे धरा दिन विनाश के आये |

उल्टा उल्टा जो चले कहीं पहुँच ना पाये ||

फुलसन्दे वाले बाबा कहते गुरू को ईश्वर मान|

तब तूपावेगा दोनो दुनियाँ में सम्मान ||



                                                                                                           सर्वोच्च साधना


परमब्रह्म के ध्यान में स्थित हुए सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं

नयसीद्वति द्विष: कृणोष्युक्थशंसिनः। 
नृभि सुवीर उच्यसे|| 
ऋ0 6 | 45 1 6 ऋषिः- 
बार्हस्पत्यः शंयुः।। देवता-इन्द्रः|| छन्दः-गायत्री।।
 सर्वश्रेष्ठ वीर किसे कहना चाहिए ? अन्त में तो प्रत्येक गुण की पराकाष्ठा परमब्रह्म में ही है, परिपूर्ण वीरता का निवास भी उसी में है। उसकी वीरता का अनुकरण करने वाले मनुष्य सच्चे पुरूष उस परमपुरूष को ही सुवीर नाम से पुकारते हैं पर उसकी वीरता कैसी है ? अज्ञानी लोग समझते हैं कि अपने शत्रु, द्वेषी को हानि पहुंचाने में सफल हो जाना ही बहादुरी है। यह निरा अज्ञान है कि क्रोध के वश में आ जाना तो हार जाना है। कोध के वश होकर मनुष्य केवल अपने को विष युक्त करता और जलाता है । क्रोधी अपने शत्रु का नश क्या करेगा ? वह तो अपना ही नाश पहले कर लेता है। ज्यों-ज्यों हम अपने द्वेषी के लिए अनिष्ट चिन्तन करते हैं, त्यों-त्यों उसमें हमारे प्रति द्वेष और बढ़ता जाता है। उसका द्वेष उसका शत्रुपन बढ़ता जाता है। शत्रु को हानि पहुंचा लेने पर उसके शरीर को चोट दे लेने पर यहां तक कि उसे मार डालने पर भी उसकी शत्रुता नष्ट नहीं होती वह तो और और बढ़ती जाती है। शत्रु के शरीर का धन का मान का एवं उसकी अन्य सब वस्तुओं का नाश करने में हम चाहे सफल हो जाएं, पर उतना ही उतना उसका शत्रुपन बढ़ जाता है। यह क्या हुआ ? वीरता परमात्मदेव से अनुकरणीय सच्ची वीरता इसमें है कि वह उसकी बाहरी किसी चीज का नाश न करे और क्रोध से हम अपना भी नाश न करें किन्तु किसी तरह उसकी शत्रुता का नाश कर दें। उसके अन्दर हम ऐसे घुसें कि वह हमारा शत्रु न रहे वह मित्र हो जाए। बहादुरी इसमें है कि हम कोध को जीतकर धैर्य रख कर अपने द्वेषी के द्वेष भाव को बिल्कुल निकाल डालें, ऐसा निकाल डालें कि वह हमारी निन्दा करना तो दूर वह हमारी प्रशंसा के गीत गाने लगे। यह शत्रु पर विजय पाना है परन्तु ऐसी विजय पाने के लिए अपने में बड़ा भारी बल चाहिए। अपने में बलिदान की न समाप्त होने वाली शक्ति चाहिए-बड़ा धैर्य चाहिए, बड़ी भारी वीरता चाहिए । वीर वह जिसकी शत्रु भी प्रशंसा करें ऐसा हमारा पुरूषार्थ हो प्रयास हो तो हमारा जीवन सफल हो जावे । ये साधना और तप की उच्चता है ।

गुरू का ज्ञान अगाध है कोई कोई समझ पावे | 
गुरू की समझ माने बिना जनम अकारथ जावे || 
संयास तोलिया लेकिन समझ नहीं ले सके। 
केवल कपड़े रंग लिये मन को नहीं रंग सके। 
फुलसन्दे वाले बाबा कहते संसार में अनेक गवाँर। 
ek tu sachch tera naam sachcha,satpurush baba fulsande vale,fulsande vale baba

मन में शान्ति आई नहीं मुंह से झड़ें अंगार॥

         प्रभो ! तू हमारे हृदय-मन्दिर में बस जा 

परमब्रह्म के ध्यान में स्थित हुए सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं
सोमरारन्धि नो हदिगावो न यवसेष्वा। 
मर्यइव स्व ओक्ये|| 
ऋ0 1 | 11 | 13 ऋषिः-
 राहूगणो गोतम:।। देवता- सोमः|| छन्दः-गायत्री|| 
हे देव ! हे परमब्रह्म ! तुम मेरे हृदय मे आ विराजो, इसी में रमण करो। कहने को तो पहले बहुत बार ऐसी प्रार्थना मैंने की है तथा औरों को करते सुना है, परन्तु शायद तब मैं न तो अपने हृदय को जानता था और न तुम्हें जानता था। तुम तो मुझमें तभी विराज सकते हो जब मेरा हृदय स्वार्थ से बिल्कुल शून्य हो, सर्वथा निर्मल हो । इसीलिए अब मैने अपने जीवन के लिए भगीरथ यत्न से हृदय को पवित्र किया हैं। मैंने झूठ, हिंसा, कुटिलता, असंयम आदि विकारों के मैल को ही नहीं निकाला है अपितु बड़े यत्न से क्षण क्षण आत्मनिरीक्षण करते हुए राग और द्वेष के सूक्ष्मातिसूक्ष्म मल को भी खुरच खुरचकर निकाला है और अतएव अब इसमें भक्ति स्त्रोत भी खुल गया है, इसीलिए मैं अब तुम्हें बुलाने की हिम्मत करता हूँ | हे मेरे जीवनसार ! मैं कहता हूँ कि तुम मेरे हृदय में ऐसे आ जाओ जैसे गौवें जौ के हरे खेत में प्रसन्नता से आकर खाने का आनन्द लेती हैं, क्योंकि मैंने भी न केवल अपने हृदय को तुम्हारे योग्य स्वच्छ बनाया है, किन्तु इसमें भक्ति का रस भी जुटा रखा है मेरे इस हार्दिक प्रेम का रसास्वादन करने के लिए तुम यहां आओ। मेरा प्रेम देखता है कि अब तुम ही मेरे प्राणों के प्राण हो, तुम्हारा स्पर्श मेरा जीना है और तुम्हारा हट जाना मेरी मृत्यु है। इसलिए मेरा हृदय पुकारता है कि तुम मुझमे आकर सदा रमण करो। क्या मेरा सच्चा ज्ञानमय प्रेम तुम्हें यहाँ नहीं खींच लाएगा ? नहीं, मैं भूल करता हूँ, तुम मेरे हृदय में न केवल आओ किन्तु आकर इस तरह से बस जाओ जैसे मनुष्य अपने घर में रहता है व रमण करता है। मेरी भक्ति आर्त, जिज्ञासु व अर्थार्थी की भक्ति नहीं है, क्योंकि मैंने अपने हृदय से अब अहंकार को भी सर्वथा निकाल दिया है। अब यह शरीर भी तेरा है, यह हृदय भी अब तेरा अपना घर है । मैं -मम सब यहाँ से लोप हो गया है। हे आत्मा के पति ! हे अमृतपुरूष ! सर्वथा विशुद्ध इस हृदय में तू आकर विराज जैसे चाहे वैसे रह अब यह तेरा घर हो गया है।

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