मैं दुखों का अनन्त अंधेरा हूँ |
तू अनन्त दया का सागर है |
मेरे सतगुरु मेरी आँखों में |
बे अनन्त दया का सागर है।
मैं थका हुआ एक राही हूँ
तू कल्प वृक्ष की छाया है
मेरा जनम-मरण हे स्वामी
तेरे मन से उपजी माया है।।
मेरे दिल को ऐसा बना दे तू |
जो दुःख में भी दुख नहीं माने
हे प्रभु जो तेरे सेवक हैं, |
मुझे भी वो अपना सेवक माने ।।
जो प्रभु सुमरन करते तेरा
तो स्वर्ग का उनमें सवेरा है
जो तुझसे दूर भटकते हैं
तो नरक का उनमें डेरा है।।
फुलसन्दे वाले बाबा कहे प्रभु मुझे
औरों के दुःख दे दे
वो सुख तू दुखियों को दे दे।।
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