सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले
सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला prachin rishiyon se jab main mila

सतपुरुष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं एक रात्री 2 बजे की आराधना के बाद हमारी चेतना शरीर से अलग हो गई केवल एक प्रकाश को अपने स्थान पर हम देखने लगे वह प्रकाश आकाश मण्डल  में चलते चलते मानसरोवर के निकट पहुँचा जहाँ बहुत से ऋषि कल्पवृक्षों के तले परमब्रहम की आराधना में लीन थे उनके मंत्र जपने से एक झिलमिल प्रकाश होता था उन ऋषियों की इस चरण वंदना की तब उन्होने परसाद रूप में इस तरहा के ज्ञान बचन हमें प्रदान किये

प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला 

वे करते थे ब्रह्म उपासना ।


 धरती गगन में फैला था । 
झिलमिल झिलमिल चाँदना।। 

सबसे पहले मान सरोवर के उस शान्त तपोवन में काकभुशण्डी ऋषि के चरणों में हमने प्रणाम किया तब उन्होंने इस प्रकार से कहना प्रारम्भ किया

मन की मलीनता से ऋषि भी कव्वे कत्ते बन जाते, 
मन की निर्मलता से पशु देवता जैसे बन जाते, 
तुमही ईश्वर का मन्दिर हो है 
तुममें ही ईश्वर की आत्मा । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला 
वे करते थे ब्रह्म उपासना ।। 

वे ऋषि कहने लगे मैं एक जनम में मूर्ख और दुर्बुद्धि था बात बात पर गुरु का अपमान करता उनको कठोर बचन कहता रहता था मेरे गुरु परम शान्त आत्मा वाले ब्रह्म ऋषि लोमश थे। एक दिन मैं परमब्रह्म का मंत्र जप रहा था सामने से गुरु आये उनको देखकर मैनेआँखें बंद करली । शिव कुपित हो गये उन्हाने मुझे शाप दिया तू सांप की तरहा कुण्डली मारकर बैठा रहा गुरु की वंदना करने को उठा नहीं जा तू अगले जनम में सांप बनेगा । तू कब्वे की तरहा काय काय करता रहता है तू कव्वा बनेगा मेरे गुरू हाहाकार कर उठे उन्होने शिव के चरण पकड़ लिया कहा-देव! क्षमा करें! ये तो मुख । अज्ञानी है इसे क्षमा करें प्रभु! 
तव माया वश जीव जड संतति फिरत भुलान | 
तिस पर क्रोध ना कीजये पारब्रह्म भगवान ।। 
नमामि शमीशान निर्वाण रूपम विभुं व्यापकम् ब्रह्म वेदसस्वरूपम् || 
इस प्रकार लोमश ऋषि ने उनकी स्तुति की तब शिव ने कहा मेरा बचन मिथ्या नहीं हो सकता किन्तु मैं एक वरदान भी देता हूँ तुम्हारा शिष्य जिस जून में जायेगा इसको अपने पिछले जनम याद रहेंगे और ये आज जैसा दुर्बुद्धि है ऐसा नहीं रहेगा और अन्त के जनम में ये मेरु पर्वत पर कल्पवृक्ष नीचे ऋषि काकभुशण्ड बनेगा और सदा के लिये अजर अमर हो जायेगा । काक भुशण्डी ऋषि ने कहा ब्रह्म मार्ग में असावधान रहने वाला मनुष्य मेरी तरह दुख उठाता है सदा ही धर्म मर्यादा का । पालन हम करना चाहिये। उसके बाद लोमश ऋषि को हमने नमन किया तब उन्हाने इस प्रकार के ज्ञान बचन कहे

सृष्टि के प्रारम्भ से ही जो लगे
 पारब्रह्म के ध्यान में 
ब्रह्म रूप हैं वो पुरूष 
जो हैं पारब्रह्म के ध्यान में,
 बाहर भीतर है वही है
 सब में उसका चाँदना ।। 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला 
वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।


व्यास मुनि को हमने नमन किया तो वे बोले

चारों वेद पढ़े कोई या 6शास्त्रों का ज्ञाता हो, 
धर्माचरण के बिना नास हो बहस्पति हो या विधाता हो, 
जिसने किये हैं सतकरम पाया उसी ने परमात्मा । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।

श्रंगी  ऋषि ने ये बचन कहे 
गुरू का वचन जो माने नहीं 
उसकी दुर्गति होती है, 
गुरू की सेवा से ही सदा नौका पार होती है,
सागर कभी मत छोड़ये 
गडढों से पड़ेगा माँगना। 
प्राचीन ऋषियों से जब में मिला 
वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।

पाराशर मुनि को हमने नमन किया तब उन्होने इस प्रकार से ज्ञान बचन कहे

अच्छा बुरा वक्त आदमी पे आता जाता रहता है,
संकटों में धीर पुरूष शान्त बना रहता है, 
व्याकुलता के समय में तुम अपने मन को थामना । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला
 वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।

ब्रह्मा के पुत्र मरीचि को हमने नमन किया वे मुस्कुराकर बोले
धर्माचरण जो करता है 
वो सारे पदारथ पाता है, 
पूरण काम छोड़कर के 
ब्रह्मस्वरूप हो जाता है, 
मन के पीछे ना चलना 
कभी भटकाती है कामना । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे 
करते थे ब्रह्म उपासना ।।

शुकदेव मुनि कहने लगे
आत्मा के कटोरे में परकाश को जिसने भरा, 
बचपन से जो तप में लग गया 
अजर अमर वो हो गया, 
जनम मरण के सागर को तैर के पार है करना, 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला 
वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।

कश्यप ऋषि ने कहा 
सारे देवता तेरे भीतर परमेश्वर का ध्यान करें, 
वे ही तृष्णा में भरके तपस्या में व्यवधान करें, 
मन ही पशु और पशुपति इस मन को सत्य से बाँधना । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।




अंगिरा ऋषि बोलेब्रह्म 
अग्नि में तपके सोरण तू हो जायेगा, 
तृष्णा के आँगन में ना जा मट्टी तू हो जायेगा,
 तारा गिरा जो अम्बर से खो देगा अपना चाँदना । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।

देवगुरु बृहस्पति ने कहा

ज्ञान को रख मस्तक पर तमस को स्वयं से दूर रख,
परमेश्वर के प्रकाश से आत्मा भरपूर रख, 
ज्ञानदीपक हाथ ले डूबे हुओं को उबारना । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।

अत्री मुनि ने कहा
चन्द्रमा सी शीतलता जिसके मन में रहती है, 
परमात्मा की करूणा सदा उसपे बहती रहती है, 
शीतल रखना मन को सदा कुण्ठा से मत बाँधना । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।
भारद्वाज ऋषि कहने लगे
चिन्ता ना कर वो जगत पति सबका पालन करता है,
धन्य है जो निश्चिन्त होके ब्रह्म चिन्तन करता है, 
परमेश्वर के सिवा कभी मत किसी से माँगना । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।

भृगु ऋषि ने कहा
तन मन के ताप तृष्णा से बढ़ते जाते रात दिन, 
उद्वेग मन का अशान्त करता इस हृदय को रात दिन, 
जीवन में सुख हो या दुख हो हंसके सभी स्वीकारना । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।

मारकण्डे ऋषि बोले
तीनों काल में आत्मा में ब्रह्म सुगन्धी बहती है, 
ज्योति पुरूष के ध्यान में सदा सुनहरी रहती है, 
झड़ता है अमृत मस्तक में आँखों में होता है चाँदना । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।



पुलस्त ऋषि ने कहा

नक्षत्र पक्षी की तरहा अम्बर में विचरते हैं
नगरों को ध्वस्त करते हैं 

जंगल में मंगल करते हैं, 
नहीं काल से बचा कोई
पग पग पे खुद को संभालना। 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला 
वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।

महामहिम वीरभद्र ने कहा
ब्रह्म ऋषि होके भी जो ऋत करम नहीं करता, 
डूब जाता है भव में भवसागर नहीं तरता. 
खुद तरो भवसिन्ध से औरों को भी तारना । 

नन्दीश्वर ने कहा 
गुरू बचन से बढ़के जग में तीरथ कुछ नहीं ।
 गुरू ही पारब्रह्म है इससे बढ़कर कुछ नहीं। 
गुरू ही हैं परमात्मा मानुष उसे ना जानना ।। 

मन को शीतल कीजिये तज मन का संताप । 
सांस सांस कीजये आतम ब्रह्म का जाप । 
शान्त हृदय ही स्वर्ग है सतकरम है साधना ।।
सपने की तरहा आत्मा में संसार की तस्वीर है. 
आँख खुले तो कुछ नहीं जल पे खींची लकीर है. 
जो कुछ है एक ब्रह्म है सब में उसी को जानना । 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।

शिव ने कहा 
धीरज रखने से एक दिन वश में सब कुछ हो जाता, 
चलते चलते लंगड़ा भी पर्वत शिखर चढ़ जाता, 
धीरज रख मन में अपने उस तरफ को झाँकना ।
परशुराम ने कहा
छल कपट से विद्या वैभव खो देता है आदमी, 
ब्रह्मतेज खो देता पछताता है आदमी, 
मटटी में सोने के कण मिलें । 
इनको जतन से पहचानना ।
 प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।। 

तपो तेज से जो पाया है उसकी तुम रक्षा करो। 
यम नियम धारण करो धर्म की रक्षा करो । 
सब कुछ धरम से मिल जाता स्वयं को ही निखारना। 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।

फुलसन्दे वाले बाबा कहें 
जो धरती है सूरज के सामने, 
दूर है उससे अंधेरा है प्रकाश के सामने, 
लीन हो प्रभ के प्यार में पापों से ना होवे सामना ।। 
प्राचीन ऋषियों से जब मैं मिला वे करते थे ब्रह्म उपासना ।।
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