“मैं एक नदी हूँ”
बहुत से आते हैं मेरे पास ।
कोई हंसता है कोई होता है उदास ॥
कोई मुझमें पत्थर फेंकता है,
कोई उन्है बीनता है।
मैं वहीं थीं, मैं वही हूँ और वही रहूंगी ॥
ना जाने कब से बहती आई हूँ कब तक बहूंगी॥
जो मेरे पास आते हैं वो अपनी प्यास बुझाते हैं।
जो मेरे ऊपरी रंग देखते हैं वो प्यासे ही चले जाते हैं॥
मैंने न जाने कितने कटुवचन सहे हैं।
न जाने दुनिया में मेरे कितने रूप बहे।
मैं वहीं नदी हूँ मैं वही नदी भी बही रहूंगी ।
कभी मैं सूख जाती हूँ कभी मैं भर जाती हूँ पानी से ।
कभी मैं मिलती हूँ ज्ञानी तो कभी अभिमानी से ॥
मुझे में से किसी को मिले हैं मोती
और किसी किसी प्यास भी शान्त ना होती ।
तू भी अगर ढूढता तो तेरी भी आँख ना रोती॥
उसे कुछ याद नहीं पर मैं कुछ भूला नहीं।
ये अबकी बात नहीं जबकी है जब वो कहते थे.
हम कुछ भी भूलेंगे नहीं॥


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