सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले
सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

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सतगुरु से अमरत पाया फिर भी नहीं उसे पीता है।

देवता होके जानवर की तरह से क्यों जीता है।।


अमरत बख्शा सतगुरु ने, तूने उसे उँधा डाला


स्वर्ग की रोशनी को तूने, मट्टी में मिला डाला


इसीलिए सागर में भी तू घड़े की तरह रीता है।।


चौरासी का फंदा कटना दुनियाँ में आसान नहीं।


सतगुरु तुझे छुड़ाने आये तू माने अहसान नहीं


तेरी जुबान पे रात दिन दुनियाँ का ही गीता है।।


फुलसन्दे वाले बाबा तुझे धरम की राह दिखाते हैं।


तेरी आत्मा को परमेश्वर के घर तक ले जाते हैं।


गुरु सेवा बिन काल को नहीं किसी ने जीता है।।


चमन के रहने वाले भी जाने क्यों काँटों से बचते हैं,


चलते हैं पत्थरों पे मगर छालों से बचते हैं।


दुनिया की बात छोड़ो जो अच्छों को बुरा बताती है,


कुदरत के चाहने वाले भी दुःख सहने से बचते हैं

लेखक एमव गायक : सत्पुरुष बाबा फुलसंदे वाले


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