तू समन्दर प्यार का हे तेरे सिवा कहां जाऐं हम
तेरे दर से सतगुरू क्या प्यासे ही उठ जाऐ हम
तन मन के अंधकार में हंस मेरा उदास है
आँधियों में किस तरहा दिल का दिया जलाऐ हम
तेरे दर से सत गुरू ....
आत्मा की प्रीत भी मृत्यू के देवता से है
संसार बन है जनम मरण का जाऐ तो कहां जाऐ हम
तेरे दर से सत गुरू ...
शाम जब ढलने लगे मेरी जिन्दगी की हे पारब्रह्म
गोद मे लेकर सुलाना जब बहुत थक जाऐ हम
तेरे दर से सत गुरू....
एक तु सच्चा तेरा नाम सच्चा
गायक एवं लेखक :सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले


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