गुरू चरन कमल बलहारी रे
मेरे मन की दुविदा टारी रे
भवसागर में नीर अपारा
डूब रहा नही मिला किनारा
पल में लिया उबारी रे
मेरी मनकी ......
काम क्रोध मद लोभ लुटेरे
जनम जनम के बैरी मेरे
सबको दीना मारी रे
गुरू चरन.........
द्दैत भाव सब दूर मिटाया
पूरन ब्रह्म एक दरसाया
घट घट जोत निहारी रे
गुरू चरन .......
जोत जगत गुरू देव बताई
फुलसन्दे मे तेरी जोत जगाई
मेरी मानस देह सुधारी रे
गुरू चरन.....
एक तु सच्चा तेरा नाम सच्च्चा
ek tu sachcha tera naam sachcha
लेखक एवं गायक :सतपुरुष बाबा फुल्संदे वाले


0 Comments
आपका हम स्वागत करते है