सतोगुणी व्यक्ति सदा आत्मा में जागता रहता।
परमब्रह्म के ध्यान में दिन रात लगा रहता ॥
रजोगुणी उलट पुलट करता रहता सदा।
एक मिनट भी चैन से कभी नहीं रहता।
फुलसन्दे वाले बाबा कहते तमो गुणी की कथा।
आलस में दुर्बुद्धि में पड़ा सोता रहता॥
नीचे समन्द है
नीचे समन्द है ऊपर अम्बर,
घट में जहर की बोझ थकान ।
बिना तेरे ओ मेरे मीता पाऊँ कहाँ चैन बिसराम ।
जीव पखेरू जनम जनम से देह जिस्म में ढूँडे थान
बिना तेरे साहिब अविनाशी पाऊँ कहाँ चैन बिसराम ।
मैं मूरख मैं बाबरा मैं सब विध नीच अजान राख लेओ
हे समरथ स्वामी साहिब मेहेरबान ।
ज्ञान ध्यान मैं करम न जाना मैं सब बिध अंध अजान
तूने रचा तू ही जाने है अपना आप निजाम |
साहिब नाम अराधये आगे पंथ अंधेर
नाम जपत होवे उजयारा टूटे जमो का घेर ।
साहिब तेरा नाम साँचा काटे सकल कलेश।
जनम जनम के दुख मिटें फटें पाप करम के लेख ।
देह जगत संसार से आतम हुआ उदास,
चल पंछी उस देस को अपने पिया के पास ।
पंछी खिड़की से झाँकये नील धुंद आकाश
बड़ी दूर किसी घाट से कोई देवे है आवाज ।
जब साँझ ढलने लगे जब अंधेरा उतरने लगे
मेरी आतम गुफा में तब तू ही दीवा जलाना मेरे साहिब मेहेरबान ।
जीवन और मौत के घाट हैं दो जहाँ तेरी जोत बले
जहाँ कोई ना संग चले वहाँ तू ही संग संग चले ।
गुरू की खलड़ी ओढ़के तेरा ध्यान धरूँ करतार,
सबका दाता एक तू, तू साँचा परवरदिगार |
इस खलड़ी को ओढ़ के मैं घूमा जगत जहान,
दूसरा कोई ना मिला सिवा एक भगवान ।
काया से निकल तेरा मंत्र जपूँ मिलूँ उजयारी में जाय,
प्रीतम तेरी याद में झुका सिर उठता नाय ।
रहम बिचारो साँचे प्रभ लेओ गले लगाय
जनम मरण के अंधकार में आत्मा झकोले खाय ।
तू अकाल अलख निरंजन
अजूनी अदेह अगम अविनाशी तू साँचा परवरदिगार,
तू सदा साहिब सरकार तू मेरा साहिब करम बिनासी
तुझ बिन कौन काटे चौरासी।
जब साँझ ढलने लगे जब अंधेरा उतरने लगे,
मेरी आतम गुफा में तब तू ही दीवा जलाना मेरे साहिब मेहेरबान ।
परमेश्वर तेरी नज़र पड़े तो लाखों करें परणाम,
और जो तेरी नजर फिरै तो गल गल के गिरे चाम ।
आज नहीं तो कल सखी छुट जायेगा देस माटी होगी ओढ़ना और बिछौना रेत ।
कस्तूरी सी काया साजन जाय मिलेगी खाक,
इकले अलख जगाओगे कोई ना पूछेगा बात।
हथजोड़ी करके मना रहे अपने रब को लोग,
तू क्या मुर्दा सा पड़ा लगा कौन सा रोग।
जीव जो जो इच्छा करे यदिवो उसको मिल जाये।
तो इसका जीवन ही उल्टा पुल्टा हो जाय॥
सतपुरख करैं आराधना बरसे अलख का नूर,
तू जहाँ का तहाँ खड़ा लोग पहुँच गये दूर |
मेरा मेरा क्या करे तेरा सब संसार,
भर भर आँखें रोयेगा बंजारे चलती बार ।
किससे कैसा वास्ता जग भटयारे की सराय,
रात बिताई चल दिये पता नहीं कहाँ जाय ।
तेरा कोई भी नहीं मीत आशना यार,
तुझको कुछ दीखे नहीं ये लिये खड़े कटार ।
सच्ची जात परमेश्वर की सच्चा उसका नाम,
सतपुरखो पल पल सुमरो पाओ बेहद में बिसराम ।
तेरी सुहागन यूँ कहे मेरी चुड़ियों की रखयो लाज,
पारब्रह्म तू खसम हमारा प्रभ गरीब नवाज |
दिन रात फिरूँ बेहोश हुई मैं आत्मा तेरे ध्यान में,
कभी तो प्रभ पुकारये मैं बेसुध तेरे ध्यान में ।
लहरों के बीच कमल में जैसे कोई सुगन्ध है सोई हुई
ऐसे ही तेरी पीड़ा मैंने अपने घट में है बोई हुई।
जुग बीते एक हंसनी इकली पार करे है सिन्धु खारा
उदास उदास कल्प जुग बीते खेया अब तक नहीं किनारा ।
आकाश की सूनी आँखों में एक पंछी इकला उड़ता है
एक चिंगारी माथे पर रखे खोया खोया फिरता है।
अ रूहों के मालिक अब अपनी रोशनी कबूल कर
काँटों में बिंधी फिरती हैं
रूहें प्रभ तुझको भूलकर ।
मैं उठ आराधना करूँ तेरी झुका तेरे आगे जुगों से
सम्मोहन में बँधे प्राण जुग से आकाश चढ़ते उतरते।
बेचैनी की आग को ओढ़े अंधकार में विकल भटकते,
परमपुरख की खिंचे कशिश में दम दम पीऊ पीऊ रटते।
सीप जैसा मुँह खोले रूह दम दम तकती है आकाश,
एक नूर की बूंद बक्शये खोलये घट का परकाश।
विष अमृत शिला पर बैठ पागल सा मैं बैरागी बाबरा,
पलक ना झपke एक खिण को बेहोश तेरे ध्यान में हुआ।
एक अविनाशी रात दिन सुमरूँ पल पल पुरख अपार,
एक अनन्त अलख निरंजन बेरूप बेअन्त निरंकार |
एक टक तेरे गगन में बेहोश हुआ जाने क्या निहारूँ,
मेरा हाथ थामये प्रभ तुझ बिन कौन है जिसे पुकारूँ।
तेरी जोत तले झुका सिर उठता नहीं है मेरा,
रहूँ रात दिन एक अचिन्ता परमपुरख सतसाहिब मेरा ।
यों ध्यानस्थ यों तन्मय मेरे प्राण हुए हैं तुम में,
मृत्यु कमान पर चढ़ा तीर ज्यों खिंचा हुआ हो हर क्षण में ।
दुख छाया सी मैं रूह तुम्हारी भटकती फिरूँ जगत के बन में,
आह करूँ जतन क्या स्वामी तुम बिन व्याकुल क्षण में।
सुन्न महल में कब हे प्रीतम पाँव लागूंगी तुम्हारे,
अधर शिला पर ध्यान जमाकर कब आऊँगी पास तुम्हारे ।
तिरकुटी से रंग कर बाना कब निकलूँ यायावर होकर,
नक्षत्रों के पार लगूं कब गले तुम्हारे पागल होकर ।
जुगों से मैं व्याकुल कब तू मेरा माथा चूमे प्रीतम,
और कब मैं टूट देह से आ गिरूँ तेरे बीच कदम ।
किस विध तू मुझको अपनाये स्वामी कोई जुगत बताइये,
मैं बेहोश हुआ दीवाना क्या इसका होगा बतलाइये।
देह पड़ी माटी के ऊपर हंस रमे नीले आकाश,
बिना साँस के पीऊ पीऊ जपता भवसागर में रहे उदास ।
धुएं की धार में लय होकर के जोत चढ़े ज्यों अगम सुन्न को,
ऐसे ही मैं जोत ओढ़कर कभी जा चढ़ता अधर गगन को।
जहाँ जोत से जोत गले मिलती हैं
प्रभ मुझको वो घाट दिखा दो,
अपने काँधे से लगाकर लहरों में थपक कर मुझे सुला दो।
तू ही तू हो हे दाता मुझे तो बीच से आज निकालो,
नक्षत्रों के पार धूली में मेरी छाया को गले लगा लो।
साँझ ढलने से पहले मेरे माथे पर अपनी जोत टिका दो,
हे प्रभवों के प्रभ महाप्रभ मुझको अपने प्राण समा लो।
जगत पशु तू पति हमारा सच्चा मालिक अकह अनामी,
अपने चरण की ओट राखयो अपने संग इकन्त निष्कामी ।
परमपुरख मेरे साँचे प्रभ क्षण को ना होवे तुझसे बिछोह,
साँस साँस बिंधी रहे तुझमें दीजे असीस हे स्वामी मोय ।
तेरी उजयारी जाय समाऊँ कभी ना बिछडूं तुझसे यार,
हे साहिब हे मेरे मालिक रूह हाथ उठाये करे पुकार |
सिर ऊपर तेरा नूर नूरानी रमे रूह तेरी धुनतार,
घोर गाज में चढ़ती जाती धुन धुन तार नाद की धार ।
सकल जोत की तुम हो ज्योति हे साहिब हे सुख दाता,
हरदम सीस झुका है मेरा, तेरी उजयारी तले हे साथा ।
नीचे सम्न्द है ऊपर अम्बर घट में जहर की बोझ थकान,
बिना तेरे ओ मेरे मीता पाऊँ कहाँ चैन बिसराम ।
तेरी आराधना में हरदम मेरा सर झुका रहे,
तेरी कशिश में रूह का तार तार खिंचा रहे।
ना कभी पलक झपके मेरी ना निगाह हटे कभी,
हरदम मुझे तेरा ही तेरा दीदार रहा करे ।
पत्थर की तरहा खामोश हूँ मैं तेरे ख्याल में
बुत में रूहें बेहोश को कभी तो होश हुआ करे |
आसमान में फरिश्ते जब तेरी आराधना में खड़े हों,
मेरा इश्क भी फरिश्ता बनके तेरे कदम चूमा करे।
जीवन और मौत के घाट हैं दो जहाँ तेरी जोत बले,
जहाँ कोई ना संग चले वहाँ तू ही संग संग चले।
लाखों परदे आसमान के जहाँ पे बले चिराग,
अदभुत नूर का तखत बिछा जहाँ साहिब रहे बिराज ।
तैंतीस करोड़ देवता करते तेरी आराधना,
दोनों हाथ पसार के मैं माँगू तेरा चाँदना
फुलसन्दे वाले बाबा कहते प्राण पंछी तो उड़ता जाता |
रात दिन उस पुरूष ब्रह्म के प्यार के गीतों को गाता ।
करे गरीब तेरी आराधना मेरे साहिब तेरी आराधना।
एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा


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