सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले
सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

स्वस्तिवाचन :swastivachan: ek tu sachcha tera naam sachcha

 स्वस्तिवाचन

अपनी तपोस्थली में प्रातः के तारों की छाँव में अपने देवतुल्य शिष्यों से घिरे सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वालों ने इस प्रकार स्वस्तिवाचन किया


ओम यम ब्रह्मा वरूणेन्द्र रुद्र मरूत: स्तुन्वन्ति दिव्य स्तवै वेद:सांग पद क्रमोपनिषद: गायन्ति यम सामगा: ध्यानावस्थित तद् गतेन मनसापश्यन्ति यम योगिनो,यस्यान्तं ना विदः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम:|| एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा||1||

ब्रह्मा, इन्द्र वरूण, यम, कुबेर, रूद, यानी,शिव, मरुद्गण, आदि 33 करोड़ देवता दिव्य स्त्रोतों से जिसकी उपासना करते है। वेद उपनिषदों का चिन्तन करते हुए सामगान गाने वाले ऋषि जिस आदि देव परमेश्वर की महिमा को गाते रहते हैं। अपने मन को परमेश्वर में लगाये एकाग्र चित्त से योगीजन अपने भीतर जिस पारब्रह्म की आभा में तद्रूप हुए जिसका दर्शन करते रहते हैं। जिसके अन्त को ना तो देवता जानते हैं ना असुर जानते हैं, उस सनातन पुरूष परमेश्वर को नमन है, नमन है, नमन है।


एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्व भूतान्तर आत्मा कर्माध्यक्षसर्व भूताधिवास: साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च:|| एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा।। 2|| |


वह परमेश्वर एक ही है, वह सभी जीवों के भीतर रहस्य रूप होके समाया हुआ है, वह सर्वव्यापी बनकर जगत के कण कण में उद्भासित हो रहा है, वह सभी प्राणियों का अन्तर आत्मा है, सत्कर्मो की प्रेरणा करने वाला है, कर्मो के फल को प्रदान करने वाला है, वह सब के साथ रहने वाला साक्षी रूप है, वो चेतन पुरूष है,अपने अजर अमर मोक्षधाम में सदा स्थित रहता हैं, र्निगुण निराकार है।


अग्नि मीले पुरोहितमयज्ञस्य देवं ऋतविजम् होतारं रत्न धातमम्|| एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा।। 3||

हे महान तेजोमय ! हे परमेश्वर ! जो अपने करमो को पवित्र करके तेरी आराधना करता है, उसे तू दिव्य सम्पदा और सब रत्न प्रदान करता है। तू उसे मन शान्ति, और आत्मा में प्रकाश और जगत में सब तरह की सम्पदाएँ दे देता है, वह व्यक्ति कभी दुखी नहीं रहता, वह सदा तेरी स्तुति में निमग्न रहता हुआ अपनी आत्मा को संसार की सेवा में अर्पित कर देता है।


अग्न आयाहि वीतये गृणानो हव्य दातये नी होता सत्सि बहर्षि|| एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा||4||

हे परमेश्वर ! हे महान दाता! तू तो चराचर विश्व ब्रह्माण्ड में व्यापक है, प्रकाश बनकर समाया है तेरी स्तुति प्राचीन ऋषियों ने प्राचीन देवताओं ने की है, और तेरी स्तुति के बल से उन्होंने अमृत को पाया है, असम्भव को उन्होंने सम्भव कर लिया था, हे करूणा के समुद्र परमेश्वर! अपनी आत्मा की अंधेरी गुफा में तेरे अजर अमर प्रकाश को पाने के लिए तेरे द्वार से दिव्य सम्पदाओं को पाने के लिये हम तेरा आवाहन करते है, तुझे अपनी आत्मा के आँगन में बुलाते हैं, तेरी स्तुति करते है। हे प्रभु! हमारी प्रार्थना को सुन।


अथोमिन्द्र मुपासितम् अमृत ब्रह्म सनातनम्त्वाम कामये अहम्।। एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा||5||


हे आदपुरख ! हे सच्चे सिरजनहार ! मैं केवल तेरी ही उपासना करता हूँ। हे अमृतपुरूष हे सनातन ब्रह्म! मैं तो एक तुमको ही चाहता हूँ | तुम ही मेरे मन के बसंत हो। हे परमेश्वर! जब कुछ नहीं होता बस केवल तुम ही होते हो। अनन्त शून्य में तुमसे तुम्हारा दिव्य तेज यानी अलौकिक प्रकाश उत्पन्न होता रहता है और सारी सृष्टि को प्रकाशित करता रहता है।


देवं ज्योर्ति संजीवनम् मुखे तवे स्तवन हिरण्यं सोम पीवनम्|| एकतू सच्चा तेरा नाम सच्चा।। 6||

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हे देव ! हे परमेश्वर ! तुम तो मरे हुओं को भी जीवित कर देते हो, मेरे मुख में तुम्हारा स्तोत्र है, अजर अमर देवगणों के संग तुम्हारे अमृत को पाकर मेरी आत्मा सुनहरी हो गयी है।


पवस्व सोम महान्त समुद्रः पिता देवानाम् विश्वाभिधाम् :|| एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा||7||


हे परमेश्वर ! तू मलीन आत्माओं को पवित्र करता है, तू अमृत का समुद्र है, तू सभी देवताओं का पिता है।

तू धर्मी मनुष्यों को मित्र की तरह प्यार करता है सारा जगत तुझमें शरण पाता है, संसार सागर के किनारे किनारे देवआत्माएँ तेरी आराधना करते है, और तृष्णा दुख क्लेश की आग में जलते लोग अपने हाथों में विष लिये इस सागर के तट पर विचरते फिरते है, उन्हें शान्ति नहीं मिलती।


नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टया अमैर मित्रमर्दय|| एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा||8||

हे परम तेजोमय ! हे परमेश्वर! तुझे नमन है। तू धर्मी मनुष्यों को मित्र की तरह प्यार करता है, तथा पाप आत्माओं को दण्ड देता है। हमारे अवगुणों को और आन्तरिक बाहरी शत्रुओं को नष्ट कर।


त्रातार मिन्द्रं वितार मिन्द्रं हवे हवे सुहवं शूर मिन्द्रं हुवे नु शकं पुरहूत मिन्द्रं हविर्मधवा वेत्तविन्द्रम्|| एकतू सच्चा तेरा नाम सच्चा||9||

हे पारब्रह्म परमेश्वर ! हम तेरा ही आवाहन करते है, दिव्य सम्पदा पाने के लिये हम तेरी स्तुति करते है, हे प्रभु ! मेरे पापों की अग्नि मुझे फूंक डालने के लिये मेरा पीछा करती है, तेरी करूणा अमृत का बादल बनकर बरसती है, मुझे शान्त और पवित्र कर देती है, तुझे महाबली जानकर तुझे महा सम्पदावान जान कर मैं तेरे द्वार पर आया हूँ जैसे चील तूफान में अपने कमजोर पंख वाले नवजात शिशु की रक्षा के लिये उसके पीछे फिरती है, ऐसे ही तू मेरे जीवन के आँधी तूफान भरे दिनों में मेरी रक्षा करने के लिये मेरे संग लगा रहता है।


अच्छा व इन्द्रं मतय स्वर्युव सदध्रीर्चि विश्वा उश्तीर नूषत परिष्वजन्त जनयो यथा पतिं मयन्न शुन्ध्युम मधवानं ऊतये|| एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा|| 10||


जिस तरह नदी समुद्र में गिरकर शान्त हो जाती है, जैसे कोई नारी अपने पति की शरण में पहुँचकर शान्ति को पा लेती है, जैसे कोई निर्धन व्यक्ति महान दाता के द्वार पर जाकर अपने मन की कामनाओं को पा लेता है, इसी प्रकार हे पारब्रह्म! हम तेरी स्तुति करते है वे शब्द तेरे चरणों में पहुँच कर अमृत बनकर पुनः हम पर बरसते हैं।

धर्म: मंगलं उत्कृष्टं अहिंसा संयम: तप:। देवा अपितम् नमष्यन्ति धर्मे सदा मन:|| एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा|| 11||


धर्म सबसे महान मंगल यानी शुभ करने वाला है, धर्म मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र है, जो हमेशा उसका कल्याण ही करता है, अहिंसा यानी किसी को कष्ट ना देना, संयम यानी मन वाणी और इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना और तपस्या, ये धर्म के लक्षण है जिसका मन सदा धर्म में लगा रहता है जो कभी भी धर्म के यानि कर्तव्य के कठोर पथ से पीछे कदम नहीं हटाता आकाश के देवता उस पर फूल बरसाते हैं उसे प्रणाम करते हैं।


स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा स्वस्ति न पूषा विश्व वेदाः। स्वस्ति नस्तार्यो अरिष्ट नेमि स्वस्ति नो बृहस्पर्तिदधातु स्वस्ति नो बृहस्पर्ति दधातु|| एकतू सच्चा तेरा नाम सच्चा।। 12||


हे सनातन पुरूष ! हे जगत के सम्राट! हे महान कीर्तिमान ! तू हमारा कल्याण कर हे पालनहार हे विश्वआत्मा ! हे परम ज्ञानी तू हमारा कल्याण कर हे अनिष्टों का नाश करने वाले तू हमारा कल्याण कर हे परम हितैषी ! हे विराट आत्मा! तू हमारा कल्याण कर कल्याण कर।


देव द्विज गुरू प्राज्ञ पूजनम शौचम आर्जवम्। ब्रह्मचर्यअहिंसा च शारीरंतप उच्यते।। एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा || 13||


देव यानि परमेश्वर की पूजा आराधना ब्रह्मवेत्ताओं गुरू और ज्ञानी जनों का सत्कार, पवित्रता सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा यह शरीर के तप कहे जाते हैं।


अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्याय अभ्यसनं चैव वांगमयं तप उच्यते।। एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा।। 14||


जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यर्थाथ भाषण है और जो वेदशास्त्र के पठन पाठन का एवं परमेश्वर के नाम जप का अभ्यास है वह वाणी का तप कहा जाता है।


मन: प्रसाद: सौम्यत्वं मौनं आत्मा विनिग्रहः। भावसंशुद्धि रित्येततपो मान सम उच्यते|| एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा।। 15||


मन की प्रसन्नता, शान्त भाव, ईश्वर भक्ति करने का स्वभाव मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भली भाँति पवित्रता, इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है।

यरिमन सर्व यत: सर्व य: सर्व सर्वतश्च य:। यश्च सर्वमयो नित्यंतरमै सर्व आत्मने नम:|| एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा|| 16||

जिस परमात्मा के संकल्प से यह समस्त संसार विद्यमान है जिससे यह सब उत्पन्न होता है जो सर्वस्वरूप है जो सब ओर व्याप्त और सर्वमय है जो शाश्वत अजर अमर नित्य और सर्वमय है उस सर्वात्मक परमात्मा को नमस्कार है।

आ नो मित्रावरूण घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम् । मध्वा रजांसि सुक्रतू।। 17||

हम प्राणमय द्वारा मन को वश में करें, इस प्रकार बुद्धि को तीव्र करें और कर्मो को पवित्र व मधुर बनाएँ। उदुत्येसूनवोगिर: काष्ठा यज्ञेष्वव्रता वाश्रा अभिक्षु यातवे|| 18||

हमारा जीवन ज्ञानमय , कर्ममय व भक्तिमय हो।

अतीहि मन्युषाविणं सुषुवांसमुपेरया अस्य रातौ सुतं पिब|| 19||

आशावादियों के सम्पर्क में चलो, ज्ञान व शक्ति का संचय करो। यही मेधातिथि का मार्ग है।


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