इस तन के लोक में देवता विचरण करते
इस तन के लोक में देवता विचरण करते
पुरूष ब्रह्म का वे दिन रात सुमरन करते।
इन्सान बनाया तुम्हें जानवर जैसे ना बनों
स्वारथ और क्रोध में भेड़ये जैसे ना बनों।
जो हंसते रहते है देवताओं जैसे हैं
गुस्सा करने वाले पिशाचों जैसे हैं।
संसार में आकर के क्या लिया तूने
एक भी आदमी का जो भला नहीं किया तूने ।
मैने गुरू के ज्ञान की बाँसरी को जब सुना
अविनाशी पुरूष ब्रह्म की आवाज को सुना।
जैसे हंस के पीछे कोई हंसनी उड़ती है
मेरी आत्मा परमेश्वर तेरे पीछे फिरती है।
यूँ तो कितने हम सफर थे मेरे साथ में
सब छोड़ गये मुझको दुख की रात में।
दुनियाँ में आकर के बता क्या लिया तूने
प्रभ के परकाश को भी खो दिया तूने ।
वो पुरूष सनातन ही महादेव कहलाता
देवों के हृदय में जो है पूजा जाता।
धर्म रूपी वृषभ पे वो आरूढ़ रहता है
हर आत्मा की ज्योत में वो छुपा रहता है।
वो धरती पे विचरता है सुख वर्षा करता है।
अमृत पिला के वो अजर अमर करता है।
तृष्णा के कारण ही है क्लेश जीवन में
वर्ना यहाँ से वहाँ तक अमृत है जीवन में।
फुलसन्दे वाले बाबा करते हैं प्रार्थना
अँधयारी आत्माओं में प्रभ कर दे चाँदना।
लेखक एवं गायक :सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

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