अ दो जहाँ के मालिक रहमत तेरी कहाँ है
अ दो जहाँ के मालिक रहमत तेरी कहाँ है।
तूफान में घिरा हुआ मेरा भी कारवाँ है।।
मृत्यु के लोक में हमें लेके कौन आया।
तृष्णा के कपड़े पहना के दागदार बनाया ।।
वो दो जहाँ का मालिक हमें दूंडता फिरता है।
वो धुंद में सितारों को पुकारता फिरता है।।
हम नफ्सा-नफ़्सी के यहाँ शिकार हो गये हैं।
अम्बर से नीचे क्या आये बीमार हो गये हैं।।
तस्वीर तेरी हर शक्ल में दीखती है मुझको।
वो ही रोशनी पुरानी तेरी दीखती है मुझको ।।
तेरी स्तुति के मंत्र पंछी सुना रहे हैं।
मेरे सर में सुर मिलाके सामवेद गा रहे हैं ।।
अ मेरे सतगुरू तू साकी है दो जहाँ का।
सच कहूँ तो सूरज है तू दो जहाँ का।।
आँखों में सतगुरू की जब आर-पार देखा।
चौदह तबक तलक मैंने जहूरे नूरे यार को देखा।।
लगता है लोग भूल गये वेद उपनिषद को।
मैंने आत्मा के प्याले में रखा है तेरे मधु-रस को ।।
ये कुम्हार जाने उसने कैसा घड़ा बनाया।
सागर किनारे लाके मैंने घड़ा डुबाया ।।
इस अक्ल के पास सिर्फ अकल के कुछ नहीं है।
तेरा इलाज गुरू की नज़र के सिवा नहीं है।।
हर एक मुकाम से आगे है मुकाम तेरा।
ये ज़िन्दगी सफर के सिवा और कुछ नहीं है।।
सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले


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