रस्ते में हो गई रात तेरा घर ना आवे हाथ,
जाने कितनी दूर तेरा ठिकाना हो गया।
काहे की जिन्दगी काहे की बन्दगी,
मेरा दिल तो पहले ही तेरा दीवाना हो गया।।
अच्छा है पर्दे में ही त पर्दापोश रहे।
पर्दा उठ गया तो फिर किसको होश रहे ।।
अलख पुरख मेरे साजना मेरे नैन नशे में चूर |
किससे पूछ तूने अपनी बस्ती बसाई दूर ।।
बादल बरसे कपड़े भीगें गगन में बिजली चमके।
ना जाउँ तो वादा टूटे रूठे साजन हमसे ।।
फागुन आया साजना खेलो रंग गुलाल ।
तेरे इश्क की आग से मेरी आँखें हो गई लाल ।।
फागुन आया ऐ सखी साजन हाथ ना आवे ।
कोई उसको सातवें आसमान पे बतलावे ।।
गुरू के अन्दर पैगम्बर और सारे देवता बैठे।
सारे देवता बैठे पिछले सारे ही गुरू बैठे ।।
जाने कितने लोग थक के रास्ते में बैठे।
कितने ही पूरन धनी के पहल में जाके बैठे।।
क्या किसी को कहे बुरा मत गैर का जिकर करो।।
मैं तुम्हें देखा करूँ तुम मुझको देखा करो।।
तीन लोक की सम्पदा करूँ सतगुरू पे कुर्बान ।
वो ही मेरा दिलबर वो ही पारब्रह्म भगवान ।।
मेरी निगाहें हों और तेरा चाँद सा चेहरा हो।
चाँद रहे तू सामने ना कभी सवेरा हो ।।
गुरू की गलियों में बरसों तक मैंने झाडू लगाई
जग हँसाई खूब हुई पर हो गई दिल की सफाई।।
झाडू लेके हाथ में मैं गगन का जीना चढ़ा।
देखा तो सच्चा सुल्तान अपने महल में खड़ा ।।
इश्क इलाही सिर पे चढ़ा मैं नाचूँ बीच बजार।
सुनो रे संतों फागुन आया आई बसंत बहार ।।
जग जंगल में रात हुई क्या करूँ मेरी माए।
कौन मेरा हाथ पकड़ के पिया के घर पहुँचाये ।।
फुलसन्दे वाले बाबा कहें मैंने गुरू की चादर ओढ़ी।
बाँध के घुघरू छम-छम नाचूँ लोक-लाज सब छोड़ी।।
सत्पुरुष बाबा फुल्संदे वाले


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