ek tu sachcha tera naam sachcha
मैं कंजरी तेरी, नाचती फिरी
मैं कंजरी तेरी, नाचती फिरी काहे की मेरी इज्जत, क्या बदनामियाँ ।
तू शाहों का भी शाह, सजन बेपरवाह इज्जत दे जिल्लत दे, सब तेरी मेहरबानियाँ ।
सच्चे साजन तेरा राज नहीं किसी ने पाया।
जिसने तुझसे दिल लगाया कहीं चैन ना पाया।।
कोठे ऊपर मैं खड़ी खड़ी मचाऊँ शोर।
इश्क के जाल में मेरी तरहा कोई मत फंस जाइयो और।।
नहीं किसी को दीखता पर संग-संग रहता।
वो सोणा साजन सदा पर्दे में ही रहता।।
फिरूँ नाचती मैं बैरागन घर-घर नाच दिखाया।
जिस कारण जोगन बनी कहीं उसका पता ना पाया।।
मरज इश्क का बहुत बुरा दुख लाखों ने पाया।
जंगल हो या बस्ती हो चैन कहीं ना पाया।।
दरस दिखाके गले लगाके छोड़ गया रस्ते में।
जैसे वो ठग चोर था मुझे ठग लिया सस्ते में।।
दीखे नहीं पर हर जगहा वो साथ-साथ चलता।
उसका जादू हर जगहा जोर शोर से चलता।।
प्रेम ना करना वर्ना तुम्हारी अधो गति हो जाएगी।
पता चलेगा जब रो-रो के रूह अंधी हो जाएगी।।
वहाँ कलालों की बस्ती जहाँ पीने लोग आते।
जो भी प्याला पीवे वो भी दीवाने बन जाते।।
जिस जग को आँखें देखें वो नहीं कुछ काम का।
प्रभ प्रीतम दीखे नहीं जीवन किस काम का।।
प्रेम के हत्थे जो चढ़े लुट गये बीच बजार।
फिर भी लोग ना मानते कर बैठते प्यार।।
बाग मेरा सूख गया भरी बहार में।
चैन कहीं ना पाया, उस सुल्तान के प्यार में।।
उस पति परमेश्वर को कोई देख नहीं सकता।
छू नहीं सकता उससे बोल नहीं सकता।।
उस साजन की याद में फिरती मैं चुपचाप।
कब आवे मेरा सतगुरू कब पकड़े हाथ ।।
फुलसन्दे वाले बाबा कहें मत गली सजन की जाइये।
जो तुझको जाना ही है मत लौट के वापस आइये ।।

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