भज रे मानस गुरू चरणम् ।
BHAJ RE MAN GURU CHARANM
ek tu sachcha tera naam sachcha
भज रे मानस गुरू चरणम् ।
दुस्तर भवसागर तरणम् ।।
गुरू की किरपा से पशु भी पशुपति बन जावै ।
गुरू की किरपा से पशु भी पशुपति बन जावै ।
जिसने पूजे चरण गुरू के वे समाये ब्रह्म की उजियारी ।।
परमेश्वर किरपा करे तो गुरू की किरपा होवे ।
गुरू किरपा बिन परमेश्वर भी मन का मैल ना धोवे ।।
गुरू की सेवा जो करै उसको पूजै संसार ।
गुरू की सेवा जो करै उसको पूजै संसार ।
जिसने गुरू का दरस ना पाया उसका जनम बेकार ।।
गुरू उपदेस से तरे भव सिंध ब्रह्मरूप बन जावे।
गुरू उपदेस से तरे भव सिंध ब्रह्मरूप बन जावे।
![]() |
| SATPURUSH BABA FULSANDE VALE |
गुरू किरपा से मुक्ति होवे फेर जनम नहीं पावे ।।
ek tu sachcha tera naam sachcha
गुरू की पूजा से गुरू सेवक ऋद्धि सिद्धि सब पाता ।
ek tu sachcha tera naam sachcha
गुरू की पूजा से गुरू सेवक ऋद्धि सिद्धि सब पाता ।
गुरू को परमेश्वर जो माने परमपुरख कहलाता ।।
गुरू समान नहीं कोई देवता गरू पारब्रह्म समान ।
गुरू समान नहीं कोई देवता गरू पारब्रह्म समान ।
गुरू की वंदना करें सब देवता गुरू को ईश्वर मान ।।st.
गुरू चरणोदक जो कोई पीवे लाखों तीरथ का फल पावे ।
गुरू चरणोदक जो कोई पीवे लाखों तीरथ का फल पावे ।
गुरू की छाया में जपे परमेश्वर सिद्ध पुरूष बन जावे ।।
जो ब्रह्म तीन गुणों से पार गुरू में उसका होवे उजियार |
जो ब्रह्म तीन गुणों से पार गुरू में उसका होवे उजियार |
गुरू किरपा से पावे निरंकार सागर में जैसे मिले पटार ।।
सारे रतन गुरू पूजा से पावे वेदों का सार घट में ही पावे |
सारे रतन गुरू पूजा से पावे वेदों का सार घट में ही पावे |
गुरू किरपा सब सम्पदा पावे दुख दोष और दरिद्र मिट जावे ।।
गुरू के हुकम में जो कोई चलता
जुग जुग उसका दीवा जलता
ek tu sachcha tera naam sachcha
दख का गुबार तूफान जब चलता
गुरू के हुकम में जो कोई चलता
जुग जुग उसका दीवा जलता
ek tu sachcha tera naam sachcha
दख का गुबार तूफान जब चलता
सच्चा गुरू केवल संग चलता ।।
जगत वृक्ष पर चढ़े जो लोग नरक कुण्ड में गिरते वे लोग ।
जगत वृक्ष पर चढ़े जो लोग नरक कुण्ड में गिरते वे लोग ।
जो गुरू उन पर किरपा करै पापी से पापी नर भी तरै ।।
गुरू चरणों में है ब्रह्म अग्नि जल जाते सब पाप ।
गुरू चरणों में है ब्रह्म अग्नि जल जाते सब पाप ।
बिन गुरूमंत्र मिले नहीं मुक्ति लाखो मंत्र करो जाप ।।
सात समन्दर सब तीरथ में करे जो कोई स्नान ।
सात समन्दर सब तीरथ में करे जो कोई स्नान ।
गुरू की सेवा कीजये जम का फंद कट जावे ।।
गुरू दीक्षा बिन मंत्र जपे उसको लागे पाप ।
गुरू दीक्षा बिन मंत्र जपे उसको लागे पाप ।
जनम मरण का मिले ना किनारा कटे ना दुख संताप ।।
गुरू चरणों को छोड़के करे भरोसा और ।
सुख सम्पत्ती कभी हाथ ना आवै
गुरू से ज्ञान लीजये सीस दीजये दान ।
गुरू चरणों को छोड़के करे भरोसा और ।
सुख सम्पत्ती कभी हाथ ना आवै
गुरू से ज्ञान लीजये सीस दीजये दान ।
जाने कितने बह गये करके गुरू से गुमान ।।
जिनको करनी सिर्फ बुराई चाहे उन्हें दूध शहद पिलावे ।
जिनको करनी सिर्फ बुराई चाहे उन्हें दूध शहद पिलावे ।
माथे में सलवट पड़ी रहें मुख से ना दुर्गन्ध जावे ।।
गुरू से कुछ ना छुपाइये गुरू से झूठ ना बोल
गुरू से कुछ ना छुपाइये गुरू से झूठ ना बोल
भली बुरी खोटी खरी गुरू आगे सब खोल ।।
गुरू की आज्ञा ताड़के जो सेवक कहीं जाय ।
गुरू की आज्ञा ताड़के जो सेवक कहीं जाय ।
जहाँ जावे वहाँ काल है चीर फाड़के खाय ।।
गुरू का हर क्षण ध्यान कर जैसे मणी भुजंग ।
गुरू का हर क्षण ध्यान कर जैसे मणी भुजंग ।
गुरू बचनो में समाया रहे ये गुरूमुख का अंग ।।
फुलसन्दे वाले बाबा कहें जिसे सतगुरू नहीं भावै ।
फुलसन्दे वाले बाबा कहें जिसे सतगुरू नहीं भावै ।
निर्जन में बने ब्रह्म राक्षस जनम जनम दुख पावै ।।
भज रे मानस गुरू चरणम्। दुस्तर भवसागर तरणम् ।।
भज रे मानस गुरू चरणम्। दुस्तर भवसागर तरणम् ।।
गायक एमव लेखक
ek tu sachcha tera naam sachcha
जसवन्त सिंह फुलसन्दा से कहते हैं-21.5.2015 की सुबह आठ बजे आश्रम आश्रम में
हवन में हम सब बैठे थे अचानक शरीर की चेतना लुप्त हुई और दूसरे स्थानो में विचरने
लगी । आसमान में निगाह घूमने लगी जहां सुनहरे अक्षर में एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा लिखा था
लगी । आसमान में निगाह घूमने लगी जहां सुनहरे अक्षर में एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा लिखा था
उसे देखते देखते उससे आगे पहुँच गये वहाँ देखा एक जगह बहत सुन्दर है वहाँ आदमी के रूप में एक प्रकाश धरती से आसमान को छू रहा था उस प्रकाश रूप व्यक्ति के सिर पर मुकुट बँधा था उसका एक पग में धरती पर तो दूसरा आसमान को छू रहा था कुछ ही देर में वह प्रकाश का आदमी छोटा दिखाई देने लगा। वह आसमान में फिर रहा था । फिर वह धरती पर उतर आया इधर उधर विचरता रहा ।
मैने नमन किया और कहा- प्रभु विराजिये । वह जोत में जाकर समा गया, 22 की सुबह फिर आठ बजे हवन में मैं वहीं आसमान में पहुँच गया देखा वो जगह हीरे मोतियों से सजी है और वहाँ दिव्य सुगन्ध से महक रही है तथा हीरे मोतियों से जड़ित एक सिंहासन बना है उसके चारों और सुगन्ध ही सुगन्ध फैली हुई हैं वह प्रकाश रूप पुरूष सिंहासन पर बैठा है वहाँ देवताओं की सभा लगी है वहीं पर हमारे सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले एक बड़े सिंहासन पर विराजमान है मैंने गुरूजी के चरण लिए फिर बाबा फलसन्दे वाले बाबा उस प्रकाश रूप आदमी में समा गये फिर उस आदमी में से निकलकर वापस अपने सिंहासन पर बैठ गये और वहाँ पर उपस्थित सभी देवताओं ने सतगुरू की जय जयकार का घोष किया फिर सभी देवताओं ने सतपुरूष से कहा हे परम पुरूष आपकी आज्ञा हो तो हम सभी आपके साथ पथ्वी लोक में चलें और इतना कहकर सब ने अपनी म्यान से तलवारें निकाल लीं तब सतपुरूष ने सभी देवताओं को शान्त करते हुए कहा कि मैं अकेला ही काफी हूँ तुम चिन्ता ना करो सब कुछ ठीक हो जायेगा इतना कहकर सतपुरूष वहां से वापस आ गये 23.को मैं फिर उसी सभा में पहुंच गया जहाँ प्रकाश से भरपूर पुरूष बैठा था सभी देवता वहाँ थे मैं भी नमन कर उस सभा में चला गया और बैठा बैठा एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा मन्त्र जपता रहा उन देवताओं में से एक देवता मेरे निकट आया और प्रकाशरूप सिंहासन के पास ले गया मैंने वहां मत्था टेका और आवाज आई |st.
ek tu sachcha tera naam sachchaमैने नमन किया और कहा- प्रभु विराजिये । वह जोत में जाकर समा गया, 22 की सुबह फिर आठ बजे हवन में मैं वहीं आसमान में पहुँच गया देखा वो जगह हीरे मोतियों से सजी है और वहाँ दिव्य सुगन्ध से महक रही है तथा हीरे मोतियों से जड़ित एक सिंहासन बना है उसके चारों और सुगन्ध ही सुगन्ध फैली हुई हैं वह प्रकाश रूप पुरूष सिंहासन पर बैठा है वहाँ देवताओं की सभा लगी है वहीं पर हमारे सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले एक बड़े सिंहासन पर विराजमान है मैंने गुरूजी के चरण लिए फिर बाबा फलसन्दे वाले बाबा उस प्रकाश रूप आदमी में समा गये फिर उस आदमी में से निकलकर वापस अपने सिंहासन पर बैठ गये और वहाँ पर उपस्थित सभी देवताओं ने सतगुरू की जय जयकार का घोष किया फिर सभी देवताओं ने सतपुरूष से कहा हे परम पुरूष आपकी आज्ञा हो तो हम सभी आपके साथ पथ्वी लोक में चलें और इतना कहकर सब ने अपनी म्यान से तलवारें निकाल लीं तब सतपुरूष ने सभी देवताओं को शान्त करते हुए कहा कि मैं अकेला ही काफी हूँ तुम चिन्ता ना करो सब कुछ ठीक हो जायेगा इतना कहकर सतपुरूष वहां से वापस आ गये 23.को मैं फिर उसी सभा में पहुंच गया जहाँ प्रकाश से भरपूर पुरूष बैठा था सभी देवता वहाँ थे मैं भी नमन कर उस सभा में चला गया और बैठा बैठा एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा मन्त्र जपता रहा उन देवताओं में से एक देवता मेरे निकट आया और प्रकाशरूप सिंहासन के पास ले गया मैंने वहां मत्था टेका और आवाज आई |st.
कि जो चाहो मांगलो मैं सोच में पड़ गया कि क्या मांगू? फिर मैंने उनसे पूछा कि ये सभा किसकी सभा है उन्होंने बताया कि ये सभा पारब्रह्म परमेश्वर की है और प्रकाश पुरूष ने कहा मैं ही परमात्मा है, ये सभा मेरे ही हुकुम से रोज होती है मैने सोचा की हमारे सतगुरू ही परमात्मा हैं और वो आज इस रूप में हैं जब वो वरदान मांगने को कह रहे हैं तो मैंने वरदान माँगा और कहा हम बुरे भले जैसे भी हैं हमें सतगुरू के चरणों में लगाये रखना हे परपुरूष परमेश्वर ! हमें निभायें रखना इससे ज्यादा हमारे लिए और कुछ नहीं हे परमेश्वर तू हम पर अपनी कृपा दृष्टि बनायें रखना हम कभी अपने गुरू के चरणों से कभी अलग ना हों बस यही वरदान हमें देना फिर मैं आश्रम में वापस आ गया ये सतगुरू की मुझ पर अति कृपा हुई जो मैने आप सबको बता दिया है ।st.
ek tu sachcha tera naam sachcha


4 Comments
एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा
ReplyDeleteek tu sachcha tera naam sachcha devta ji
DeleteEk tu sachcha Tera nam sachcha
ReplyDeleteएक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा
Deleteआपका हम स्वागत करते है