मेरा प्यार आँखों से देखोगे कैसे
उसे हाथ से छु के देखोगे कैसे
खुदा भी कहीं आँखों से दीखता है |
निराकार आँखों से कहीं दीखता है।
है अम्बर से ऊँचा समन्दर से गहरा
है अम्बर से ऊँचा समन्दर से गहरा
सच्चे मोती पारस से भी ऊँचा ठहरा
जहाँ हर फरिश्ता सर झुकाए दीखता है।।
जहाँ हर फरिश्ता सर झुकाए दीखता है।।
सितारों को अम्बर से कैसे चुगोगे -
मेरे दिल के काँटे कैसे चुगोगे |
जमीं पे गिरे आँसू कैसे चुगोगे।।
हवा का बबूला है चार दिन को
हवा का बबूला है चार दिन को
चमन में ये पंछी है चार दिन को
इन्सान की हस्ती है चार दिन को।।
इन्सान की हस्ती है चार दिन को।।
क्यों दिल में जहर को जगह दे रहे हो
क्यों हिर्स की अग्नि को हवा दे रहे हो
क्यों फुलसन्दे वालों को सदा दे रहे हो।।
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लेखक एवं गायक :-फुलसंदे वाले बाबा
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जिन्दगी वो नहीं तूफा से जो गुरेज करे,
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जिन्दगी वो नहीं तूफा से जो गुरेज करे,
जिन्दगी वो है जो तूफाँ के दरम्या गुजरे।
ये जिन्दगी तो मेरी उनकी बन्दगी है फकत,
उन्हीं के दर पे ना गुजरे तो फिर कहाँ गुजरे।।
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मेरा हदय है एक किताब जिस पर मैने तेरा नाम लिखा ।
मत मुझे ठुकरा देना मैने ये करार लिखा।
दिल की आरजू थी कोई मुझको ऐसा मिले।
जिससे मिलने के बाद ना किसी से मिलने की तमन्ना रहे।
फुलसन्दे वाले बाबा कहते प्रभ प्रीतम जब तुम मिले।
सब कुछ मिल गया मुझे दोनो जहां मिले।
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रूप यौवन नश्वर है सतपुरूष बाबा फुलसन्दे वाले कहते हैं-गंधराज राजा की अग्रमहिषी पटरानी निखेमा को अपने रूप पर बहुत घमण्ड था शिव रूप निंदा करते हैं ऐसा सुनकर वह कभी भी उनका उपदेश सुनने ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित तपोवन में नहीं जाती थी जब कि वह उसके राज्य सीमा के निकट ही था एक दिन वह राजा के बहुत कहने पर जाने के लिये तैयार हुई। शिव उसके मन की बात जानते थे शिव ने नंदी से कहा नंदी देवी को पीने के लिए वस्तु प्रशाद दो नंनदी ने एक पात्र में वह पेय रानी को थमाया वह इतना कड़वा था कि रानी को तुरन्त उल्टी आ गई भगवान ने ओमन को जान, परिष्द के बीच उपदेश देते हुए एक अत्यन्त रूपवती स्त्री को बनाया। जो भगवान के पीछे खड़ी हुई पंखा कर रही थी। खेमा ने पहुंचकर जब उसे देखा तो बैठकर उसी के रूप को आश्चर्य में पड़कर देखने लगी भगवान बोले- खेमा ! तू क्या समझती है कि रूप में सार है किंतु इस शरीर के असार होने को देख। भगवान ने काया की अपवित्रता को बताते हुए कहा- चलते या खड़े होते, बैठते या सोते यह काया की गति है। इस शरीर के अंदर क्या भरा हुआ है। इसके अंदर पेट भरा हुआ है यकृत आदि अंग तथा चर्बी और मल भी इसी में भरा हुआ है । जो मूर्ख अविद्या के कारण अंधे बने हुए हैं। वे गंदगी से पूर्ण इस शरीर में सौंदर्य ही देखते हैं। शरीर मर कर पृथ्वी पर पड़ जाता है तब फूल जाता है नीला पड़ जाता है श्मशान में फेंक दिया जाता है। और भाई बंधु उससे अपेक्षा रहित हो जाते हैं। जो बुद्ध के पदेशों को अच्छी तरह ग्रहण करता है वह प्रज्ञवान व्यक्ति शरीर की वास्तविकता को जानकर उसके यथार्थ स्वरूप को देख्ता है। गंदगी से परिपूर्ण इस शरीर के प्रति आसक्ति, राग, तथा दंभ को छोड देना चाहिये। जो इस शरीर की वास्तविकता से परिचित है वह अमृत पद निर्वाण को प्राप्त करता है। अन्य प्राणियों की काया तो काम में आ सकती है, किंतु यह दो पैरों का प्राणी अपनी अपवित्र गंदगी से परिपूर्ण इस काया को ढोता फिरता है। वह स्थान स्थान पर इस गंदगी को टपकाता फिरता है। इस प्रकार के शरीर पर जो घमंड करता है अथवा अपने थोथे रूप सौंन्दर्य के कारण दूसरों का अपमान करता है तो वह अविद्या के सिवाय और किस कारण हो सकता है ? इस गाथा को सुन खेमा ! स्त्रोतापन्न हो गई। तब भगवान ने समझायाखेमा ! ये प्राणी राग में अनुरक्त द्वेष से दूषित और मोह से मूढ़ हुए अपने तृष्णा स्रोत को नहीं लांघ सकते हैं, प्रत्युत उसी में पड़े रहते हैं ।


1 Comments
एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा 🙏🏻
ReplyDeleteआपका हम स्वागत करते है