परमेश्वर तेरा गगन महल मुझे चमके।
मेरे माथेपे रात दिन तेरी ज्योति चमके॥
माटी का दीवा है देह आत्मारोशनी की बूंद है ।
परमेश्वर है ज्योति सिन्ध जीव उसकी बूंद है।।
गुरू ने मेरा हाथ पकड़ के भवसागर से तारा |
फुलसन्दे वाले बाबा कहते गुरू प्रभ का उजियारा||
हे परमेश्वर अन्तर्यामी
हे परमेश्वर अन्तर्यामी, मेरे शरीर को तू अपना शरीर बना ले।
जोत निरंजन मेरे प्रभ प्रीतम, मेरी आत्मा को तू अपनी आत्मा बना ले।
जीव आत्मा पुण्य के कारण यदि देवता भी बन जावे
कल्प सहस्त्र भोगों में तपता फिर भी शान्ति ना पावे ।
कभी आदित्य कभी रूद्र और कभी जीव वसु बन जाता
तृष्णा को त्यागें बिना कभी भी शान्ति कोई ना पाता।
आधिभौतिक आधिदैविक आध्यात्मिक देवता होते
परम पुरख की आज्ञा में चलते कभी आज्ञा से बाहर ना होते।
ज्ञान करम उपासना से जीव देवता बन जाता
काम क्रोध लोभ त्यागे बिना पारब्रह्म को नहीं पाता।
वासना में भागते भागते उस प्रभ को मत छोड़
देना वैभव पाने की कामना में आतम साधना मत छोड़ देना।
जल थल सब में आदि पुरूष का परकाश है झिलमिलाता
निर्मल मस्तक जब हो जाता आदमी स्वयं सिद्ध हो जाता।
फुलसन्दे वाले बाबा कहते नदी सागर के आगे झुकती
हे प्रभ प्रीतम मेरी आत्मा रात दिन तेरे आगे झुकती।
लेखक एवं गायक ; सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

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