पिया ने रंग दीनी रे चदरिया
पिया ने रंग दीनी रे चदरिया।
जनम मरण का धागा टूटा बरसी प्रेम बदरिया ।।
फूल ही फूल खिले अम्बर में महकी सारी नगरिया
नैनों ने तेरे सिवा कुछ नहीं देखा सुन साँचे साँवरिया।
साँझ सवेरे नैना मेरे चुगते बिखरे तारे
इन्द्रभवन में नाचे उर्वशी मैं ना भवन तुम्हारे।
सतगुरू ने दिया प्रेम का प्याला काया हद टूटी
जोत निरंजन माथे दमके पिया बिन दुनियाँ झूठी।
इन्द्र धनुष आँखों में मेरी घिर–घिर आये बदरा
याद में तेरी इतना रोई बह गया आँखों का कजरा।
जगत किनारे बैठ के मैने फटका मन का सूप
थोथा जगत उड़ा दिया बचा पिया का रूप ।
तन उजला और मन है काला बगले जैसा भेष
इससे तो कागा भला जो बाहर भीतर एक ।
ये तन तो मेरा जहर का प्याला कैसे अमृत होवे
गगन महल पे चढ़के देखा परमपुरख मेरा सोवे ।
फुलसन्दे वाले बाबा कहते कैसे मिले करतार
ध्यान धरूँ तिरकुटी में तेरा अलख अपरम्पार |
गायक एवं लेखक : प्रभु सतपुरुष बाबा फुलसंदे वाले

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